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*समर्थ शूरा साधु सो, मन मस्तक धरिया ।*
*दादू दर्शन देखतां, सब कारज सरिया ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥७ दास्य भक्ति॥*
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*॥ दास भक्त की कृपा से प्रेत मुक्ति ॥*
दास भक्त की कृपा से, प्रेत मुक्त हो जात ।
मुक्त हुआ श्रीरंग के, हरि चरणामृत पात ॥१७७॥
दृष्टांत कथा – स्वामी रामानन्दजी के शिष्य अनन्तानन्दजी के शिष्य श्रीरंगजी के पुत्र को रात्रि में एक प्रेत दिखाई देता था । उसके भय से वह दुबला हो गया था । श्रीरंगजी जब को ज्ञात हुआ तो एक दिन रात्रि को लड़के की खाट पर वे सो गये ।
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उन्हें देख कर के प्रेत भयभीत होकर बोला – 'मैं इसी ग्राम का सुनार हूँ, पर स्त्री गमन, चोरी और झूठ आदि पाप कर्मो से प्रेत हो गया हूँ ।' अब अपने उद्धार के निमित्त आपका द्वार सेवन करता हूँ ।' श्रीरंग ने उसे भगवत् का चरणामृत पिला कर प्रेत योनि से मुक्त कर दिया । इससे सूचित होता है कि दास भक्त की कृपा से प्रेत योनि से भी मुक्ति हो जाती है ।

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