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*साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।*
*दादू प्रेम सनेह बिन, खरी दुहेली देह ॥७६॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥८ सख्य भक्ति॥*
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*॥ सखा भक्त सदा ईश्वर परायण ही रहते हैं ॥*
ईश परायण ही रहैं, सखा भक्त सब काल ।
हरि चरित्र कथते रहे, नित श्री गंगग्वाल ॥१८७॥
दृष्टांत कथा – बृजनाथ के शिष्य गंगग्वाल सखा भाव के भक्त थे । वे सदा भगवत् तथा भगवत् सखाओं का वर्णन करते रहते थे । इससे सूचित होता है कि सखा भक्त सदा भगवत् परायण ही रहते हैं ।
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*॥ सखा भक्त के साथ हरि क्रीड़ा मय युद्ध भी करें ॥*
सखा भक्त के साथ हरि, करत क्रीड़ा मय युद्ध ।
आक फलों से मारते, गोविंद स्वामी प्रबुद्ध ॥१८८॥
दृष्टांत कथा – सखा भक्त गोविन्द स्वामी एक दिन शौच के लिये गये थे । भगवान् भी उनकी अवस्था का रूप धारण करके पीछे २ जा पहुंचे और परस्पर आक के फल मै २ कर क्रीड़ा युद्ध करने लगे । इतने में गोविन्द स्वामी की माता उन्हें खोजती हुई वहां ही आ गई । उसे देख कर भगवान् भाग गये । इससे ज्ञात होता है कि भगवान् सखा भक्तों के साथ क्रीड़ा युद्ध भी करते हैं ।

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