शनिवार, 27 नवंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१३३

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१३३)*
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*१३३. मन उपदेश । पंचम ताल*
*हां, हमारे जियरा !*
*राम गुण गाइ, एही वचन विचारी मान ॥टेक॥*
*केती कहूँ मन कारणैं, तूँ छाड़ि रे अभिमान ।*
*कह समझाऊँ बेर-बेर, तुझ अजहुँ न आवै ज्ञान ॥१॥*
*ऐसा संग कहाँ पाइये, गुण गावत आवै तान ।*
*चरणों सौं चित राखिये, निसदिन हरि को ध्यान ॥२॥*
*वे भी लेखा देहिंगे, आप कहावैं खान ।*
*जन दादू रे गुण गाइये, पूरण है निर्वाण ॥३॥*
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भा० दी०- हे मनः ! त्वं मे वचनं श्रुत्वा चावधारय । हरिगुणगाथां तनु । कियदुपदिष्टं मया । अधुना तु अहंकारं त्यज । असकृदुपदिष्टे अद्यापि तव ज्ञानं न जातम् । अस्मिन् मानवदेहे हरिगुणानुवादे कृते कियानधिक आनन्दो जायते इति किं त्वं न जानासि । नहीदृशं जन्म पुनर्लभ्यते अत: स्वकीयं मनो भगक्च्चरणारविन्दयोर्निवेश्याहर्निशं भगवन्तमाश्रयस्व । किं तव बलं ये महान्तो जनाः सर्वशक्तिसंपन्नास्तेषामपि यमालये परमपीडनं भवति । अतोऽभिमानं परित्यज्य भगवद् गुणानुवादं विधेहि येन मुक्तिलभ्येत ।
उक्तहि भागवते -
आपन्न संसृति घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।
ततः सदयो विमुच्येत यद् विभेति स्वयं भयम् ॥१४॥
सकृदुच्चरितं येन ' हरिरित्यक्षरद्वयम् ।
बद्धपरिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ॥
वराह पुराणेऽपि-
सर्वधर्मोज्झिता विष्णोर्नाममात्रैकजल्पकाः ।
सुखेन यां गतिं यान्ति न तां सर्वेऽपि धार्मिकाः ॥
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हे मन ! तू मेरे वचनों को सुन तथा उनको धारण कर । भगवान् के गुणगान कर । तेरे को कितना उपदेश दिया परन्तु तेरे एक भी उपदेश नहीं लगा । अब तू अहंकार को त्याग दे । बार-बार उपदेश देने पर भी तेरे को ज्ञान नहीं हुआ । इस मनुष्य शरीर में हरि के गुण गाने में कितना आनन्द आता है, क्या तू यह नहीं जानता ? ऐसा जन्म फिर नहीं मिलेगा ।
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अतः अपने मन को भगवान् के चरणों में लगाकर दिन रात उनका भजन कर । तेरा तो क्या बल है, जो बड़े-बड़े महान् पुरुष सर्व-शक्तिसंपन्न थे, उनको यमराज के यहां हिसाब देना पडता है । अतः अभिमान को छोड़कर हरि के गुणगान कर, जिससे तू मुक्त हो जावे ।
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भागवत में लिखा है कि- प्यारे ! संसार में भयंकर विपत्ति में पड़ा हुआ व्यक्ति यदि विवश होकर भी भगवान् का नाम लेता है तो वह तत्काल मुक्त हो जाता है । जिससे यम भी भय मानता है । जिसने ‘हरि’ ये दो अक्षर वाला नाम उच्चारण कर लिया, उसने मोक्ष के लिये कमर कस ली ।
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संपूर्ण धर्मों से रहित पुरुष भी भगवान् के नाम मात्र का उच्चारण करने से सुखपूर्वक उस उत्तम गति को पा लेते हैं, जिसे धर्मात्मा लोग भी नहीं पा सकते ।
(क्रमशः)

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