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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ २५/२८*
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उत्तिम३ को आसांन४ सब, मद्धिम५ को बहु मार६ ।
कहि जगजीवन च्यारि७ तजि, चित मंहि रांम बिचार ॥२५॥
(३. उत्तिम=श्रेष्ठ साधक* (४. आसांन=सरल) (५. मद्धिम=मध्यम अधिकारी) (६. मार=बहुत कठिनता से) (७. च्यारि तजि=राग, द्वेष, लोभ एवं मोह=ये चार दुर्गुण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो श्रेष्ठ है उसे तो बहुत सब सरल है । मध्यम को संघर्ष बहुत करना पड़ता है । संत कहते हैं कि राग, द्वैष, लोभ और मोह ये चारों छोड़कर चित में राम जी का ध्यान धरो ।
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सब के करता रांमजी, ब्रह्मा वेद बिचार ।
कहि जगजीवन नांउ धरि, बहुत किया विस्तार ॥२६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कर्ता तो सब के रामजी ही हैं । ब्रह्मा ने अनेक नाम रख कर वेदों में विचार विस्तार बहुत भांति से कर दिया है
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ॐकार उतपति रची, सब महिं सब के नांम ।
कहि जगजीवन रांम रटि, कोइ८ जन परसै रांम ॥२७॥
(८. कोइ=हजारों, लाखों में एक)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक औंकार से सारी सृष्टि का सृजन किया सब के नाम भी धरे किंतु उन प्रभु का जो नाम रटे वह हजारों लाखों में कोइ एक है । जो भजन कर प्रभु को पाता है ।
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सुकिष्म अस्थिति९ सहज हरि, सुन्नि सनेही रांम ।
कहि जगजीवन ते लहैं, जे जन सुमिरहिं नांम ॥२८॥
(९. अस्थिति=स्थिति =अवस्था)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सूक्ष्म स्थिति में तो प्रभु सहज ही मिलते हैं । और राम जी शून्य यानि अस्तित्वहीन होने से बहुत प्रसन्न रहते हैं जो उनका इस प्रकार स्मरण करते है वे उन्हें अवश्य मिलते हैं ।
(क्रमशः)

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