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*मन चित मनसा पलक में, सांई दूर न होइ ।*
*निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*केवल कूबाजी*
*मरुधर माहीं झींथड़ै,*
*केवल कूबै हरि भजे ॥*
*करता कियो कुलाल,*
*भजन को भक्त उपावै ।*
*जो नर मिल है आय,*
*ताहि जन सेव दृढ़ावै ॥*
*तन मन धन सर्वस्व,*
*एक प्रभु संतन दीजे ।*
*मनुष जन्म यह लाभ,*
*और कछु वे नहिं कीजे ॥*
*मन वाच कर्म राघव कहै,*
*भ्रम रु कर्म आरंभ तजे ।*
*मरुधर मांहीं झींथड़ै,*
*केवल कूबै हरि भजे ॥२००॥*
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मारवाड़ के झींथड़े ग्राम में केवल-कूबाजी ने हरि का भजन किया था ।
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सृष्टि कर्ता ईश्वर ने इनको कुम्हार बनाया था । ये भजन करने के लिये भक्तों को उत्पन्न करते थे । जो भी नर आकर इनसे मिलता था, उसके हृदय में भक्तों की सेवा करने का विश्वास दृढ़ कराते थे ।
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आप तन, मन, धन आदि अपना सर्वस्व एक प्रभु और संतों को ही समर्पण करते थे । मनुष्य जन्म का यही लाभ समझते थे तथा वे और कुछ भी नहीं करते थे ।
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मन, वचन, और कर्म से भ्रम पूर्ण कर्मों का आरम्भ करने उनने छोड़ दिया था ।
(क्रमशः)

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