शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

*२१. बिचार कौ अंग ~ २९/३२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ २९/३२*
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प्रथम सक्ति ब्रह्मा विषनु, महादेव त्रय छंद१० ।
कहि जगजीवन हरि भगत, नांम भजै निरद्वंद ११ ॥२९॥
(१०. छंद=स्वतंत्र) (११. निरद्वंद=निर्द्वन्द्व=राग आदि दुर्गुणों से दूर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पहली शक्ति तो ब्रह्मा विष्णु महेश ये त्रिदेव स्वतंत्र हैं । संत कहते हैं कि हरि भक्त तो बिना किसी द्वन्द्व के स्मरण करते हैं ।
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प्रथम ब्रह्मा, बिस्न मन, हर हरि बांणी नांद ।
कहि जगजीवन नाद महि, रांम भगति सुख स्वाद ॥३०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पहले ब्रह्मा फिर विष्णु और औंकार नाद है । जो शिव स्वरूप है । उसी नाद में राम भक्ति के आनंद का सुख स्वाद है ।
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रांम भगति मंहि रांमजी, रांम तहां जन जाइ ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि मिलि हरि गुन गाइ ॥३१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भक्त जन जहां राम भक्ति में राममय हो जहाँ राम है, या प्रभुनाम है, वहां ही जाते हैं । संत कहते हैं कि इस प्रकार हरि भक्त सब प्रभु भाव से मिलकर प्रभु की महिमा गाते हैं । सत्संग करते हैं ।
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घण१ बाणी घण बोलणा, घण आपौ अभिमांन ।
कहि जगजीवन रांमजी, ते२ हरि कथसी आंन३ ॥३२॥
(१. घण=अधिक आत्माभिमान प्रकट करना) (२. ते=ऐसे अज्ञानी)
(३. आंन=अन्य भाषा में ही भगवान् के विषय में बोलेंगे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अधिक बोलना और अहंकार युक्त बोलना और स्वयं में भी अधिक अभिमान का होना, प्रभु महिमा भी विनय पूर्वक न करके अभिमान पूर्वक ही करते हैं ऐसे अभिमानी जन न जाने क्यों भगवत्साधना करते हैं ।
(क्रमशः)

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