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*साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ ।*
*दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥७ दास्य भक्ति॥*
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*॥ दास भक्त की बुराई से लाज ॥*
दास भक्त की बुराई, करे लगत है लाज ।
रामराय की करत पड़ी, पगड़ी बीच समाज ॥१७६॥
दृष्टांत कथा – रामराय सारस्वत ब्राह्मण थे, उनकी दास भाव ने बड़ी प्रीति थी । वे साधु सेवा और साधु दर्शन से बड़े प्रसन्न होते थे । एक समय साधु समाज में एक दुष्ट रामराय की निंदा करने लगा । उस समय उसके कुटुम्बी भी वहां ही बैठे थे ।
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सबके देखेते २ ही निन्दक की शिर की पगड़ी अपने आप उछल करके समाज के बीच में आ पड़ी और उसे ज्ञात हुआ कि मानो उसके शिर पर किसी ने चोट मारी हो । वह लज्जित हो, समाज से उठकर चालला गया । इससे सूचित होता है कि दास भक्त की बुराई से लाज लगती है ॥

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