मंगलवार, 23 नवंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१३१

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१३१)*
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*१३१. केवल विनती । त्रिताल*
*हमारे तुम ही हो रखपाल ।*
*तुम बिन और नहीं को मेरे,*
*भव-दुख मेटणहार ॥टेक॥*
*वैरी पंच निमष नहिं न्यारे,*
*रोक रहे जम काल ।*
*हा जगदीश ! दास दुख पावै,*
*स्वामी करहु सँभाल ॥१॥*
*तुम्ह बिन राम दहैं ये द्वन्दर,*
*दसौं दिशा सब साल ।*
*देखत दीन दुखी क्यों कीजे,*
*तुम हो दीन-दयाल ॥२॥*
*निर्भय नाम हेत हरि दीजे,*
*दर्शन पर्सन लाल ।*
*दादू दीन लीन कर लीजे,*
*मेटहु सब जंजाल ॥३॥*
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भा० दी०-हे प्रभो ! भवानेव सर्वदुःखहर्ता रक्षकश्चास्ति । नान्यः कश्चित्त्वविधो रक्षकः । कामक्रोधादयः शत्रवः शब्दस्पर्शादिविद्वेषिणो निमेषमात्रमपि न परिहरन्ति माम् । भवच्छरणागतिप्राप्तये प्रतिबन्धका इमे मां नरकं नेतुमिच्छन्ति । तत्राहं नरकयातनां सहिष्ये । किं बहुना, सर्वापदांबपरमास्पदभूताः सन्ति । हा जगदीश! दासोऽस्म्यहम् । शत्रुभिः पीड्यमानं मां झटिति रक्ष । भवद्दर्शना विना शोकमोहादिद्वन्द्वानि सर्वतो दिक्षु सर्वतोभावेन पीडयन्ति माम् । भवांस्तु दीनदयालुः कीयते, किमर्थं मां दुःखिनं ज्ञात्वाऽपि पुनरधिकं दुखिनं करोति भवान् । सर्वदुःखजालानि मे प्रणिहत्य स्वस्वरूपे लीनमवस्थापय । तदैव मे जीवनं सफलं भवेदन्यथा तु भारभूतमिदं मे स्यात् । प्राप्यं संप्राप्यते येन भूयो येन न शोच्यते ।
पराया निवृत्ते: स्थानं यत्तज्जीवितमुच्यते ॥
तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः ।
स जीवति मनो यस्य मननेन च जीवति ॥
जातस्तु स एव जगति जन्तवः साधुजीविताः ।
ये पुनर्नेह जायन्ते शेषा जरठगर्दभाः ॥
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हे भगवान् ! आप ही इस संसार के सब दुःखों को मिटाने वाले और रक्षक हैं । आप जैसा दूसरा कोई भी नहीं है । काम, क्रोध आदि शत्रु - शब्द, स्पर्श. आदि पांचों इन्द्रियों के विषय क्षण भर भी मुझे नहीं छोड़ते और आप की तरफ आने में बाधक हैं तथा नरक में डाल देते हैं । वहां पर मुझे नरकयातना भोगनी पड़ती है । 
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ज्यादा क्या करूं ? ये सब आपत्तियों के घर हैं । हा जगदीश ! मैं आपका दास हूं । इन दुःखों से दुःखित की रक्षा कीजिये । आपके दर्शनों के बिना शोक, मोह आदि द्वन्द्व चारों दिशाओं में पीड़ा दे रहे हैं । आप तो दयालु हैं फिर मुझे दुःखी देखकर भी अधिक दुःखी क्यों कर रहे हैं ? हे भगवान् ! आप अपना नाम, दर्शन और स्पर्श, प्रदान करके मुझे निर्भय और सुखी बना दीजिये । 
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बस, दुःखों के जालों को नष्ट करके ओने स्वरूप में लीन कर दो । तब ही मैं अपने जीवन को जीवन मानूंगा, नहीं तो भारभूत ही है । लिखा है कि- वास्तव में वही जीवन उत्तम जीवन है । जिसमें अवश्य पाने योग्य परमात्मज्ञान की प्राप्ति होती है, जिस से फिर शोक नहीं करना पड़ता तथा जो परम निर्वाण रूप सुख का स्थान है । यों तो वृक्ष भी जीते हैं, पशु और पक्षी भी जीवित रहते हैं । 
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वास्तव में उसी पुरुष का जीवन सफल है जिसका मन उन्मनीभाव को प्राप्त हो जाय । इस संसार में उसी का पैदा होना अच्छा है जो साधु जीवन यापन करता है, जिससे फिर जनम न हो । बाकी तो बूढे गधे की तरह भारवाही हैं ।    
(क्रमशः) 

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