मंगलवार, 23 नवंबर 2021

*मनमुखी का अंग १६९(१/४)*

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*सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ ।*
*ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मनमुखी का अंग १६९*
इस अंग में मन की इच्छानुसार चलने वाले का विचार कर रहे हैं ~
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अपनी अपनी खुशी१ में, चलै सबै कोइ चाल ।
जन रज्जब ज्यों हरि खुशी, त्यों कोई सके न झाल२ ॥१॥
सभी मनमुखी अपनी अपनी इच्छा१ के अनुसार चलते हैं अर्थात व्यवहार करते हैं । जैसी हरि की इच्छा है वैसे व्यवहार की लहर२ में कोई भी मनमुखी नहीं चलता ।
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मन माने सौदा करै, मन नहीं तो नाहिं ।
रज्जब मानैं राम जी, सो कुछ नहीं मांहिं ॥२॥
जो अपने मन को अच्छा लगता है, वही व्यवहार मनमुख प्राणी करता है । जिसको मन अच्छा नहीं मानता, उसे नहीं करता । रामजी जिसको अच्छा मानते हैं, उसके करने की भावना तो मनमुख में कुछ भी नहीं होती ।
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षट् दर्शन१ अपणी खुशी२, खेलै सब संसार ।
जन रज्जब रुचि३ राम की, बिरला खेलणहार ॥३॥
जोगी, जंगम, सेवड़े, बोद्ध, सन्यासी और शेष, ये षट् प्रकार के भेष१ धारी तथा सभी संसारिक प्राणी अपनी अपनी इच्छा२ के अनुसार ही व्यवहार करना रूप खेल खेलते हैं राम की इच्छा३ के अनुसार व्यवहार करना रूप खेल तो कोई बिरला संत ही खेलता है ।
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मन की भावड़ि१ सब चलै, चौरासी लख जीव ।
तो रज्जब इस चाल में, कहो किन२ पाया पीव३ ॥४॥
चौरासी लाख योनियों के सभी जीव मन की इच्छा१ के अनुसार चलते हैं तब तुम कहो, इस मन की इच्छा के अनुसार चाल में अर्थात व्यवहार में स्थित रह कर किस२ ने प्रभु३ को प्राप्त किया है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित मनमुखी का अंग १६९ समाप्तः ॥सा. ५१२८॥
(क्रमशः)

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