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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ ५/८*
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सोई साध सिध देव मुनि, ब्रह्म बराबर थीर४ ।
कहि जगजीवन ररौ म मौ पढ़ि, बरण बिचारै बीर५ ॥५॥
{४. थीर=स्थिर(=अविनाशी)} (५. बीर=भाई)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वे जो साधु हैं, सिद्ध हैं, देवता व मुनि हैं, जो ब्रह्मा के समान अमर हैं वे भी राम शब्द के *र* व *म* की महिमा विचारते हैं ।
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एक रांम एक हि अरथ, एक ही बात बिचारि ।
कहि जगजीवन एक सबद मंहि, दोइ सांचा६ नर नारि ॥६॥
(६. सांचा=आकार)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम शब्द का एक ही अर्थ है । ब्रह्म की तरह ही विचारणीय है । संत कहते हैं कि यह एक शब्द जो वर्णों से बना है स्त्रियों व पुरुषों के लिये सत्य स्वरूप है ।
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कहि जगजीवन सुन्नि है, द्वै द्वै करि कहिये एक ।
रांम रांम अक्षर उभै, गुन बिसतार अनेक ॥७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे शून्य है वो दो भी अक्षर से बना है फिर भी उच्चारण में वह एक ही है ऐसे ही राम राम दो वर्णों से बना है पर इसकी महिमा असीमित है ।
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कहि जगजीवन ऊपज्या, जहँ लगि अक्शर एह ।
रांम अलह कोइ कछु कहौ, जब लगि अंछै७ देह ॥८॥
{७. अंछै=अस्तित्व(=होना)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ यह अक्षरयुक्त शब्द राम उपजा है इसे चाहे राम कहो या अल्लाह कहते रहो जब तक देह में जान है ।
(क्रमशः)

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