शनिवार, 4 दिसंबर 2021

*जान गये उर अन्तर की हरि*

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*दादू देखि देखि सुमिरण करै, देखि देखि लै लीन ।*
*देखि देखि तन मन विलै, देखि देखि चित्त दीन ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मूरती लेकर संत पधारत,*
*केवल के वह रैनि रहे हैं ।*
*देख स्वरूप भई मन में यह,*
*नांहिं चले सु अचल्ल भये हैं ॥*
*जोर करै मन मांहि डरै जन,*
*हारि चले जब दाम दिये हैं ।*
*जान गये उर अन्तर की हरि,*
*नाम सु जान हि राय कहें हैं ॥१९१॥*
केवल कूबाजी अब अधिक प्रख्यात होकर इच्छानुसार संत-सेवा करने लगे । कोई संत प्रभु की अति सुन्दर श्याम मूर्ति अपने मंदिर में पधराने के लिये लाये थे । उन्होंने एक रात्रि केवल कूबाजी के यहां निवास किया था ।
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उस सुन्दर मूर्ति को देखकर केवल कूबाजी की इच्छा हुई कि मुझ पर कृपा करके प्रभु यहां ही रह जायें तो बहुत अच्छा हो, मैं सेवा करूं । भक्त की अभिलाषा पूर्ण करने के लिये वह मूर्ति अचल हो गई ।
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उन संतों ने अनेक उपाय किये किन्तु वह तो वहां से नहीं हिली । तब हाथ जोड़कर मन में डरते हुये प्रार्थना भी करी परन्तु वह तो अचल ही रही । जब हार के चल पड़े तब केवल कूबाजी ने जो उस मूर्ति पर खर्च पड़े थे उतने दाम उनको दे दिये ।
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केवल कूबा के मन की जान गये इससे कूबा ने उन भगवान् का नाम जानराय रक्खा ।
(क्रमशः)

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