शनिवार, 4 दिसंबर 2021

*२१. बिचार कौ अंग ~ ४५/४८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ ४५/४८*
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धरती* प्यासी नीर की, नीर अगनि मंहि बास ।
अगनि पवन चाहै गगन, सु कहि जगजीवनदास* ॥४५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पंच महाभूतों से बना यह शरीर है इसमें देह इच्छा वासना श्वास व प्रभु भजन पांच परिणाम है । जो एक दूसरे के पूरक है ।
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इन मंहि उलझे प्रांणियां, बांछै भोग विलास ।
पंच वृद्धि षटरस घटै, सु कहि जगजीवनदास*॥४६॥
(*=*. साषी का संक्षिप अर्थ यही है कि पाँचों महाभूत परस्पर एक दूसरे पर आश्रित हैं ॥४५॥ इन में उलझे हुए प्राणी की विषयवासनाओं की तृष्णा बढ़ती जाने के कारण, भक्तिभाव(साधना) में हानि होती जाती है ॥४६॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इन पंच महाभूतों में उलझकर जीव कितने ही भोग विलास की कामना करता है । जिससे इन पांच भूतों के अतिरिक्त छठे भक्ति भाव का ह्वास होता है ।
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कहि जगजीवन जीव की, जनम न भाजै भुक्ख१ ।
रांम विमुख सुख संग्रहै, सो फिर ह्वै जाइ दुक्ख ॥४७॥
(१. भूख=तृष्णा । इस के कारण उसका साधारण सुख भी दुःख में परिवर्तित होता रहता है ॥४७॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव की जन्म भर में भी क्षुधा शांत नहीं होती है वह प्रभु विमुख हो अन्य सुख संग्रह करता है जो क्षणिक है और दुख का कारण भी है ।
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आग बलै इंधन बलै, नीर बलै तिहिं ठांम ।
कहि जगजीवन क्रिपा करि, अलख बुझावै रांम ॥४८॥
संतजगजीवन जी विषय भोगों की अग्नि के परिणाम बताते हुये कहते हैं कि अग्नि जलती है उसे वासना रुपी ईंधन और जलाता है वहां ही जल भी उसके सम्पर्क में आने से उष्ण होता है जिसका यह स्वभाव ही नहीं है । इन सब पर यदि प्रभु कृपा रुपी बादल बरसें तो यह शांत हो ।
(क्रमशः)

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