बुधवार, 15 दिसंबर 2021

*योगावस्था दीपशिखा की तरह*

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*दादू जब लग मूल न सींचिये, तब लग हरा न होइ ।*
*सेवा निष्फल सब गई, फिर पछताना सोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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“ठीक जैसे तराजू के काँटे । कामिनी-कांचन का दबाव है, इसलिए ऊपर का काँटा नीचे के काँटे की बराबरी पर नहीं रहता, इसलिए लोग योगभ्रष्ट हो जाते हैं । तुमने दीपशिखा देखी है न ? जरा सी हवा के लगने पर चंचल होती है । योगावस्था दीपशिखा की तरह है - जहाँ हवा नहीं लगती ।
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"मन तितर-बितर हो रहा है । कुछ चला गया है ढाका, कुछ दिल्ली और कुछ कूचबिहार में है । उस मन को इकट्ठा करना होगा । इकट्ठा करके एक जगह रखना होगा । तुम अगर सोलह आने का कपड़ा खरीदो, तो कपड़ेवाले को सोलह आने तुम्हें देने पड़ेंगे या नहीं ? कुछ विघ्न के रहने पर फिर योग नहीं हो सकता । टेलीग्राफ के तार में अगर कहीं जरासा छेद हो जाय तो फिर तार नहीं जा सकता ।
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"परन्तु संसार में हो तो क्या हुआ ? सब कर्मों का फल ईश्वर को समर्पण करना चाहिए । स्वयं किसी फल की कामना न करनी चाहिए ।
"परन्तु एक बात है । भक्ति की कामना कामनाओं में नहीं है । भक्ति की कामना भक्ति के लिए प्रार्थना कर सकते हो ।
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"भक्ति का तमोगुण लाओ, माँ से जोर से कहो । रामप्रसाद के एक गाने में है 'यह माता और पुत्र का मुकदमा है, बड़ी धूम मची है, जब मैं अपने को तेरी गोद में बैठा लूँगा, तब तेरा पिण्ड छोडूंगा !'
"त्रैलोक्य ने कहा था, 'जब मैं कुटुम्ब में पैदा हुआ हूँ, तो मेरा हिस्सा जरूर है ।'
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"अरे वह तो तुम्हारी अपनी माँ है, कुछ बनी-बनायी माँ थोड़े ही है ? – न धर्म की माता है । अपना जोर उस पर न चलेगा, तो और किस पर चलेगा ? कहो - 'माँ, मैं अठमासा बच्चा थोड़े ही हूँ कि आँख दिखाओगी तो डर जाऊँगा ? अबकी बार श्रीनाथ के इजलास में नालिश करूंगा और एक ही सवाल पर डिगरी लूँगा ।"
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“अपनी माँ है, जोर करो । जिसकी जिसमें सत्ता होती है, उसका उस पर आकर्षण भी होता है । माँ की सत्ता हमारे भीतर है इसीलिए तो माँ की ओर इतना आकर्षण होता है । जो यथार्थ शैव है, वह शिव की सत्ता भी पाता है । कुछ कण उसके भीतर आ जाते हैं । जो यथार्थ वैष्णव है, नारायण की सत्ता उसके भीतर आती हैं । और अब तो तुम्हें विषयकर्म भी नहीं करना पड़ता, अब कुछ दिन उन्हीं की चिन्ता करो । देख तो लिया कि संसार में कुछ नहीं है ।
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"और तुम बिचवाई और मुखियाई यह सब क्या किया करते हो ? मैने सुना है, तुम लोगों के झगड़ों का फैसला किया करते हो - तुम्हें लोग सर-पंच मानते हैं । यह तो बहुत दिन कर चुके । जिन्हें यह सब करना है, वे करें । तुम इस समय उनके पादपद्मों में अधिक मन लगाओ । क्यों किसीकी बला अपने सिर लेते हो ?
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“शम्भू ने कहा था, अस्पताल और दवाखाने बनवाऊँगा । वह भक्त था । इसीलिए मैंने कहा, ईश्वर के दर्शन होने पर क्या उनसे अस्पताल और दवाखाने चाहोगे ?
"केशव सेन ने पूछा, ईश्वर के दर्शन क्यों नहीं होते ? मैंने कहा, लोक-मर्यादा, विद्या यह सब लेकर तुम हो न, इसीलिए नहीं होता ।
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बच्चा जब तक खिलौना लिये रहता है तब तक माँ नहीं आती । कुछ देर बाद खिलौना फेंककर जब वह चिल्लाने लगता है, तब माँ तवा उतारकर दौड़ती है ।
“तुम भी मुखियाई कर रहे हो । माँ सोच रही है मेरा बच्चा मुखिया बनकर अच्छी तरह तो है, अच्छा रहे ।"
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ईशान ने श्रीरामकृष्ण के चरणों का स्पर्श करके विनयपूर्वक कहा - “मैं अपनी इच्छा से यह सब नहीं करता ।"
श्रीरामकृष्ण - यह मैं जानता हूँ । वह माता का ही खेल है, उन्हीं की लीला है । संसार में फँसा रखना, यह महामाया की ही इच्छा है । बात यह है कि संसार में कितनी ही नावें तैरती और डूबती रहती हैं । और कितनी ही पतंगें उड़ती हैं, उनमें दो ही एक कटती हैं, और तब माँ हँसकर तालियाँ पीटती हैं । लाखों में कहीं दो-एक मुक्त होते हैं । रहे-सहे सब माँ की इच्छा से बँधे हुए हैं ।
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“चोर-चोर खेल तुमने देखा है या नहीं ? ढाई की इच्छा है कि खेल होता रहे । अगर सब लड़के दौड़कर ढाई को छू लें, तो खेल ही बन्द हो जाय । इसीलिए बुढ़िया ढाई की इच्छा नहीं है कि सब लड़के उसे छू लें ।
"और देखो, बड़ी बड़ी दूकानों में ऊँची छत तक चावल के बोरे भरे रहते हैं । चावल भी रहता है और दाल भी, परन्तु कहीं चूहे न खा जायँ, इसलिए दूकानदार कोठे के दरवाजे पर सूप में उनके लिए धान के लावे अलग रख देता है । उनमें कुछ गुड़ मिला रहता है । ये खाने में मीठे लगते हैं और गन्ध सोंधी होती है, इसलिए सब चूहे सूप पर ही टूट पड़ते हैं, अन्दर के बड़े बड़े कोठों की खोज नहीं करते । जीव कामिनी-कांचन में मुग्ध रहते हैं, ईश्वर की खबर नहीं पाते ।
(क्रमशः)

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