बुधवार, 15 दिसंबर 2021

*हिंसा दोष का अंग १७४(१/६)*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 *सत्यराम सा* 卐 🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*बंध्या बहुत विकार सौं, सर्व पाप का मूल ।*
*ढाहै सब आकार को, दादू येह स्थूल ॥*
==============
श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*हिंसा दोष का अंग १७४*
इस अंग में हिंसा दोष संबंधी विचार कर रहे हैं ~
.
तेज तेज को नाखवै१, त्रिगुणी२ में जु विशेष ।
उडग३ अभ्यासै4 तंगुनी५, दिन दीसै नहिं देख ॥१॥
एक तेज दूसरे तेज का नाश१ करता है और वह माया२ रचित संसार विशेष रूप से भासता है । देखो, रात्रि५ में तारे३ चमकते हुये भासते४ हैं किंतु दिन में तो नहीं दीखते । उनके तेज को सूर्य का तेज नष्ट कर देता है । यह तेज में हिंसा का दोष है ।
.
मच्छगलागल मेदिनी१, सबला निबल हिं खाय ।
रज्जब यहु मंडाण२ मत, नर देखो निरताय३ ॥२॥
मच्छ-गलागल अर्थात जैसे बड़ा मच्छ छोटी मच्छी को अपने गले से निगल जाता है, वैसे ही पृथ्वी१ में हो रहा है । सबल निबल को खा जाते हैं । हे नर ! विचार३ करके देखोगे तो इस माया रचित संसार२ में यही मत मिलेगा ।
.
द्वै मुख उपजै दोष, लागै एक हि पिंड सौं ।
तिन हुं न सुख संतोष, तो द्वै घट क्यों मिल चलहिं ॥३॥
कुरंड पक्षी के एक शरीर में लगे हुये दो मुखों में भी हिंसा दोष उत्पन्न हो जाता है । एक चोंच दूसरी चोंच के आगे चुगती है तब परस्पर दोनों में झगड़ा हो जाता है । दोनों का चुगा हुआ एक ही पेट में जाता है तो भी उन्हें एक दूसरे का दाणा चुगने में सुख संतोष नहीं मिलता । तब दो शरीर कैसे मिल कर चल सकते हैं ।
.
उभय१ वक्त्र२ बिच वैरता, काया एक कुरंड । 
तो रज्जब क्यों मिल चलै, जे दीसे द्वै पिंड ॥४॥
जब कुरंड के शरीर के दो१ मुखों२ के बीच में भी बैर की भावना आ जाती है तब जो दो शरीर भिन्न भिन्न भासते हैं, वे कैसे मिल कर चल सकते हैं ?
.
एक पिंड माँही रहै, पंचै१ पंचों बाट२ । 
तो रज्जब क्यों होयगा, द्वै घट३ का इक ठाट४ ॥५॥
एक शरीर में पंच१ ज्ञानेन्द्रियाँ रहती हैं, वे पांच विषय रूप पाँच मार्गों२ में जाती हैं, तब दो भिन्न भिन्न शरीरों३ का एक ढंग४ कैसे हो सकता है ?
.
पय१ पाणी की प्रिति को, बदन२ न वरणी जाय । 
पै३ हेरि४ हंस हिंसा भरे, मित्र विछोहै आय ॥६॥
दूध१ और जल की इतनी गाढ़ प्रीति है कि-मुख२ से वर्णन भी नहीं की जा सकती परन्तु३ देख४, हंस भी हिंसा दोष से भरे हुये हैं दोनों मित्रों का विछोह कर देते हैं अर्थात जल और दूध को अलग अलग कर देते हैं । 
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित हिंसा दोष का अंग १७४ समाप्तः ॥सा. ५१७८॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें