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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ ६५/६८*
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भूखौ दिल१ भटकत फिरै, कहा अजांण२ कहा जांण३ ।
कहि जगजीवन रांम रस, भिदै न भीतर बांण ॥६५॥
(१. भूखौ दिल=वासनामय चित्त) (२. अजांण=अज्ञानी) (३. जांण=ज्ञानी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव जब वासनामय होता है तो वह भटकता फिरता है । ज्ञान अज्ञान का भेद समाप्त हो जाता है वह फिर राम नाम स्मरण का तीर भी उसे भेद नहीं पाता जो उसका उद्धारक है ।
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गुनहगार४ गाफिल५ मतै, जीव दुखी यों होइ ।
कहि जगजीवन रांम रस, भगति गमावै सोइ ॥६६॥
(४. गुनाहगार=अपराधी) (५. गाफिल मतै=भ्रान्त दृष्टि वाला)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में जीव मतिभ्रमित हो अपराधी होता है । और अपना सुकृत भक्ति और भजन गंवा देता है ।
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जे कुछ करै तो कुछ नहीं, न करौ तो नाहीं नेह ।
कहि जगजीवन रामजी, कहि गुण बंधैं सनेह ॥६७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव संसार में कुछ भी करे तो भी गणना नकारात्मक होती है और ना करे तो निर्मोही होता है ऐसा कहा जाता है । संत कहते हैं कि कौन गुण ऐसा हो जिससे वह स्नेही हो वह तो हरि भजन ही है ।
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अन्तर* पडै सुमति करि, मिलै सो कीजे कांम ।
कहि जगजीवन नांम रटि, इंहिं गुण रीझै रांम* ॥६८॥
(*=*. श्रीजगजीवनदास जी महाराज कहते हैं=भक्त को अपने भक्तिभाव में विघ्न निवारण हेतु जीवननिर्वाह के लिये जो भी कार्य मिले उसे सद्बुद्धिपूर्वक पूर्ण करते हुए हरिभजन मैं मन लगाये रखना चाहिये । इसी कार्य पद्धति से भगवान् उस पर प्रसन्न होंगे ॥६८॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ भक्ति में भंग पड़ता हो वहां जो काम मिले उसे जीवन निर्वाह के लिये कर ले और अपना मुख्य उद्देश्य भक्ति भाव ही रखे ।
(क्रमशः)
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