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*दादू अवसर चल गया, बरियां गई बिहाइ ।*
*कर छिटके कहँ पाइये, जन्म अमोलक जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ काल का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*काल कटाय रु सीख दिई तब,*
*जात भई पछितात घणी है ।*
*पैल समै फिर पीछे न आवत,*
*रीति भली सतसंग तणी है ॥*
*शिष्य करै जन सेव दृढ़ावत,*
*राम मिले सत बात भणी है ।*
*मोल लियो कवि भाष छपै महि,*
*रीति दिखाय दिई सु बणी है ॥१९६॥*
जब तक दुष्काल रहा तब तक पति पुत्रों के सहित स्त्री पूरी को भोजनादि दिया । दुष्काल का समय व्यतीत होने पर उसको विदा कर दिया ।
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केवलजी के यहां सतसंग की बहुत अच्छा रीति थी किन्तु किया क्या जाय । पहले वाला समय पुनः पीछा नहीं आता वह अत्यधिक पश्चाताप करती हुई चली गई ।
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केवलजी जिसको शिष्य करते थे, उसके हृदय में संतजन की सेवा का भाव अवश्य दृढ़ करवाते थे और कहते थे सत्संग से ही रामजी मिलते हैं । यह बात सत ही कथन करी है ।
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नाभाजी ने अपनी भक्तमाल में लिखा है – “केवल कूबै मोल लियो” अर्थात् केवल कूबाजी ने भक्ति और संत सेवा के प्रभाव से मुझे मोल ले लिया है । चतुरदासजी कहते हैं, जिस प्रकार केवल कूबा की भक्ति की रीति कथन करने में जैसी बण सकी है अर्थात् कही जा सकी है सो तो सम्यक् रीति से मैंने कहदी है ।
(क्रमशः)
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