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*काया बाड़ी मांही माली, तहाँ रास बनाया ।*
*सेवग सौं स्वामी खेलन को, आप दया कर आया ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३७०)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*वल्लभ सुत विठलेश ने, लाल लडाये नन्द ज्यों ।*
*परिचर्या में निपुन, राग अरु भोग विविध कर ।*
*गहणा वस्तर सेज, रचत रचना स्व सुन्दर ॥*
*व्रज पति उहै गोकुल जु, धाम शोहे दीक्षित को।*
*घोष-चंद तहँ विदित, विभी वासव इच्छित कौ ॥*
*राघवभक्ति प्रताप तैं, दीपत राका चंद ज्यों।*
*वल्लभ सुत विठलेशने, लाल लडाये नन्द ज्यों ॥२३७॥*
वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथजी ने भगवान् श्रीकृष्ण को पुत्र समझकर नन्द के लड़ाया था।
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भगवान् की सेवा करने में आप बड़े ही चतुर थे। विविध रागनियों से भगवान् का यशोगान करवाते थे और विविध प्रकार के भोग लगाते थे।
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स्वयं अपने हाथों से सुन्दर सुन्दर भूषण और वस्त्र पहनाते थे तथा सुन्दर शय्या अपने हाथों से बनाते थे।
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जिस प्रकार द्वापर में गोकुल और वज्रपति नन्द का घर शोभित होता था, उसी प्रकार तैलंगी दीक्षित ब्राह्मण विट्ठलनाथजी का घर कलियुग में शोभित होता था।
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जहाँ गोकुल में आपका घर था, वहाँ घोषचन्द्र नन्दराय के घोष (ग्राम) के समान ऐश्वर्य प्रकट हो रहा था। जिसे देखकर इन्द्र भी वैसे ऐश्वर्य की इच्छा करते थे। भगवद्भक्ति के प्रताप से विट्ठलनाथजी पूर्णिमा के चन्द्रमा की भांति प्रकाशित हो रहे थे।
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वल्लभाचार्य के द्वितीय पुत्र विट्ठलनाथजी का जन्म वि० सं० १५७२ में काशी के निकट चरणाट(चुनार) में हुआ था। आचार्य उनको अपने पूर्व निवास स्थान अडैल में ले आये थे। वि० सं० १५८० में अड़ैल में उनका यज्ञोपवीत हुआ। विट्ठलनाथजी ने दो विवाह किये थे।
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पहली पत्नी का नाम रुक्मिणी था और दूसरी पत्नी का नाम पद्मावती था। उनका जीवन अधिकांश गोवर्धन और गोकुल में ही व्यतीत हुआ था। आप पुत्र भाव से दिन में कई बार भगवान् की पूजा करते थे। एक दिन वानर को देखकर आपके पुत्र अत्यधिक डर कर आपकी गोद में आ बैठे थे।
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तब विट्ठलनाथजी ने कहा - लाला। किष्किन्धा से लंका पर चढ़ाई की तब तो तुम्हारे साथ पर्वताकार बहुत से वानर थे, उनसे तो तुम नहीं डरे थे, अब एक छोटे-से वानर से ही डर गये हो ?
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उत्तर- मेरे ऐश्वयं का ज्ञान तुमको है तब तुम मुझे बालक तथा पुत्र क्यों मानते हो ? तब तो मैं सबका पड़दादा हूँ। आपने इच्छित भक्ति प्रचार करके वि० सं० १६४२ में गोवर्धन की एक कन्दरा में प्रवेश करके अपनी जीवन लीला समाप्त की थी।
(क्रमशः)
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