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*साचा सतगुरु सोधि ले, साचे लीजे साध ।*
*साचा साहिब सोधि करि, दादू भक्ति अगाध ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गौड़ी । (गायन समय २ से ६ दिन में)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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५१ गुरु लक्षण । त्रिकाल
ऐसा सदगुरु शोधर कीजे, जाकी संगति युग युग जीजे ॥टेक॥
धर्म कर्म धोका धुर१ तोड़े, तीरथ व्रत रहित ल्यौं२ जोड़ ॥१॥
निष्कामी नौखंड नियारा३, सुमिरण व्रत निवाहन हारा ॥२॥
निर्पख रहै राम गुण गावै, भरम भेष पख४ प्रीती न लावै ॥३॥
दश अवतार देखि दिल नाखै, अविनाशी उर अंतरि राखै ॥४॥
नख शिख नाम निरंतर राता, प्रेम मगन पीवै रस माता ॥५॥
विश्वासी वश पंच सु प्राना, सब विधि समर्थ साधु सुजाना५ ॥६॥
जन रज्जब ता गुरु की शरना, जिव का मेटे जामन मरना ॥७॥४॥
नीचे लिखे लक्षणों से युक्त गुरु करने की प्रेरणा कर रहे हैं ~
✦ विचार पूर्वक खोज करके ऐसा सदगुरु बनाओ, जिसकी संगति से ब्रह्म रूप होकर प्रति युग में जीवित रह सको,
✦ जो धर्म कर्म संबंधी धोखे को जीवन के अन्त१ तक तोड़ डाले, अर्थात जीवन भर धोखे में नहीं पड़े, तीर्थ व्रतादि से रहित आन्तर साधना द्वारा वृत्ति२ को ब्रह्म में जोड़ सके,
✦ निष्कामी हो, पृथ्वी के नो खण्ड रूप प्रदेश के राग से अलग३ हो अर्थात स्थान विशेष का आग्रह जिसमें नहीं हो । प्रभु का स्मरण के व्रत को निभाने वाला हो अर्थात निरंतर स्मरण करता हो,
✦ निर्पक्ष रहकर राम के गुण गाता हो, भ्रम मय भेषों की पक्ष४ नहीं रखता हो और न उनमें प्रेम करता हो,
✦ दश अवतारों को विचार द्वारा देखकर उन्हें हृदय में उपास्य भाव से न रखता हो, निरंतर हृदय में अविनाशी ब्रह्म चिन्तन करता हो,
✦ नख से शिखा तक के सभी अंग ओर रोम निरंजन ब्रह्म में अनुरक्त हों, प्रभु प्रेम में निमग्न होकर ब्रह्म का चिन्तन रस को पान करते हुये मस्त रहता हो,
✦ पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच प्राणों को अपने वश में रखता हो, जो सर्व प्रकार समर्थ ज्ञानी५ संत हो,
✦ उस गुरु की शरण जीव के जन्म मरणादि संसार दु:ख को मिटा देती है ।
(क्रमशः)

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