बुधवार, 10 अगस्त 2022

शब्दस्कन्ध ~ पद #.२३१

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.२३१)*
===============
*२३१. समता ज्ञान । ललित ताल*
*बाबा, कहु दूजा क्यों कहिये,*
*तातैं इहि संशय दुख सहिये ॥टेक॥*
*यहु मति ऐसी पशुवां जैसी, काहे चेतत नांहीं ।*
*अपना अंग आप नहिं जानै, देखै दर्पण मांही ॥१॥*
*इहि मति मीच मरण के तांई, कूप सिंह तहँ आया ।*
*डूब मुवा मन मरम न जाना, देखि आपनी छाया ॥२॥*
*मद के माते समझत नांहीं, मैगल की मति आई ।*
*आपै आप आप दुख दीया, देखी आपनी झांई ॥३॥*
*मन समझे तो दूजा नांहीं, बिन समझे दुख पावै ।*
*दादू ज्ञान गुरु का नांहीं, समझ कहाँ तैं आवै ॥४॥*
.
भादी-हे तात ! कथय त्वम् सर्वं खल्विदं ब्रौवेतिश्रुतिसिद्धेऽद्वैते सति कथं द्वैतं भवितु मर्हति । किन्तु द्वैत भान्त्या प्रतीयते । यथैकस्माच्चन्द्रमसोद्वितीयश्चन्द्रश्चक्षुदोषेण प्रतीयते ।
उक्तं हि-
सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियो ।
भेंदश्च भ्रान्तिमविज्ञानै दृश्यतेन्दाविवाऽद्वये ॥
अतो भान्त्या जीवोऽयं क्लेशान् सहते । द्वैतवुद्धिस्तु पशुवुद्धि स्तां हि-त्वा सुखी भव । यथा श्वादर्पणे स्वकीयं मुखं शरीरश दृष्ट्वा भान्त्या तत्प्रतिविम्ब भिन्न मत्वा भूक्कति शिरस्ताडनादिना मृत्युमुपैति । न हि श्वाऽऽत्मानं जानाति । यथा वा शशकसंदेशेनाऽज्ञानी सिंहः कूपे पतितो मृतश्च । यथा वा मदोन्मत: करी चिक्कणाश्पके स्वच्छायां प्रतीतौ द्वितीयो गज इति मत्वा स्वकीयकृताघातैः पीड्यते । अतोद्वैत बुद्धिर्भयावहा मृत्युजनि केतिमत्वाऽद्वैतेबुद्धि दृढीकुरु । ज्ञानेनाज्ञाननिवृत्या तज्जन्या द्वैतबुद्धिरपि निवर्तते । अतो गुरुसेवया ज्ञान प्राप्य सुखमाप्नुहि । गुरु सेवयैव ज्ञानं लभ्यते ।
उक्तं हि गीतायाम्-
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ।
यज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥
.
हे तात ! जब सर्वं खलु ब्रह्मैव इत्यादि श्रुतियों से सब कुछ ब्रह्म ही है तो फिर यह द्वैत कहाँ से आ गया यह आप ही बतलाइये । श्रुति सिद्ध अद्वैत के होते हुए द्वैत किसी भी प्रकार से सिद्ध नहीं हो सकता, किन्तु भ्रान्ति से द्वैत की प्रतीति होती है । जैसे एक ही चन्द्रमा चक्षु दोष के कारण दो दीखते हैं । ऐसे ही आत्मा में भ्रान्ति से द्वैत प्रतीत होता है ।
.
लिखा है कि –
नील और उसका ज्ञान एक साथ ही प्रतीत होते हैं । अतःनील और उस के ज्ञान में भेद नहीं है । भेद तो भ्रान्तिज्ञान जन्य है । भ्रान्ति से ही जीव क्लेशों को सहता है । द्वैत बुद्धि तो पशु बुद्धि है । इसको छोडकर सुखी हो जाओ । जैसे कुत्ता दर्पण में अपने मुख को देखकर अपने को उस दर्पणस्थ कुत्ते से भिन्न मान कर भौंकता है । और अपने ही शिरताडन के आघात से मर जाता है ।
.
जैसे शशक के कहने में आकर सिंह कूप में गिर के मर गया । जैसे मदोन्मत हाथी चमकीले पत्थर में अपना प्रतिबिम्ब देख कर दूसरा हाथी मानता हुआ उस पत्थर से टकरा टकरा कर मर जाता है । अहो यह द्वैत बुद्धि भय और मरण को देने वाली है । अतः उसको त्याग कर द्वैत में अपनी बुद्धि को स्थित करो । ज्ञान के द्वारा अज्ञान की निवृत्ति होती है और ज्ञान गुरु की सेवा से मिलता इसलिये गुरु की शरण में जाकर ज्ञान प्राप्त करके सुखी हो जाओ ।
.
गीता में कहा है कि –
हे अर्जुन ! तू तत्वदर्शी ज्ञानियों की शरण में जाकर उनकी सेवा तथा नमस्कार आदि के द्वारा प्रसन्न करके उनको निष्कपट भाव से पूछ, तब वे परमार्थ तत्व के ज्ञाता महात्मा तुम को तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे । जिसको तू जानकर फिर मोह को प्राप्त नहीं होगा ।
हे अर्जुन ! जिस ज्ञान के द्वारा तू संपूर्ण भूतों को निःशेष भाव से पहले अपने में तथा बाद में सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें