🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.२२८)*
===============
*२२८. मनोपदेश । मल्लिका मोद ताल*
*मन रे सेव निरंजन राई, ताको सेवो रे चित लाई ॥टेक॥*
*आदि अन्तै सोई उपावै, परलै लेहि छिपाई ।*
*बिन थँभा जिन गगन रहाया, सो रह्या सबन में समाई ॥१॥*
*पाताल मांही जे आराधै, वासुकि रे गुण गाई ।*
*सहस्र मुख जिह्वा द्वै ताके, सो भी पार न पाई ॥२॥*
*सुर नर जाको पार न पावैं, कोटि मुनि जन ध्याई ।*
*दादू रे तन ताको है रे, जाको सकल लोक आराही ॥३॥*
.
भा०दी०-हे मनो ! विश्वाधिपं निरञ्जनं परमात्मानं श्रीरामं मनोयोगेन सेवस्व यश्चादौ सृष्टिं रचयति प्रलये च स्वस्मिन्नेवाहरति । आकाशे सूर्याचन्द्रमसौ नक्षत्राद्यनन्तसृष्टिं निराधारां स्वमायाख्यया शक्त्या बिभर्ति । स च प्रभुः सर्वभूतस्थितोऽस्ति । पाताले वासुकिनामासर्पः सहस्त्रमुख: शेषश्चाशेषैराननैर हर्निशं तं जपति । परन्तु तस्यानन्तान् गुणानित्यत्तया विज्ञातुं न शक्नोति । यो ह्यनन्तस्यान्तं ज्ञातुं विचेष्टते स तु बालबुद्धि । अनन्ता देवा मनुष्याश्च कोटिसंख्याका मुयश्च ध्यायन्तोऽपि तस्यान्तं न विदन्ति । तेन रामेण निष्पादितमिदं शरीरं तदर्थमेव । यश्चसोकराराध्यते ।
.
उक्तञ्चामध्यात्मरामायणे उतरे सर्गे ::
प्रकाशरूपोऽहम जोऽहमद्वयोऽसकृद् विभातोऽहमतीव निर्मल: ।
विशुद्धविज्ञानघनो निरामयः संपूर्ण आनन्दमयोऽहमविक्रियः ॥
सदैव मुक्तोऽहमचिन्त्यशक्तिमानतीन्द्रियज्ञानमविक्रियात्मकः ॥
एवं सदात्मानमखण्डितात्पना विचारमाणस्य विशुद्धभावना ॥
हन्यादविद्यामचिरेण कारकै: रसायनं यद्वदुपासनं रुजः ॥
विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो विनिर्जितात्मा विमलान्तराशयः ॥
विमावयेदेकमनन्यसाधनो विज्ञानदृक्केवल आत्मसंस्थितः ॥
विश्वं यदेतत्परमात्मदर्शनं विलापयेदात्मनि सर्वकारणे॥
पूर्णश्चिदानन्दमयोऽवतिष्ठते न वेदबाह्यं न च किञ्चिदान्तरम् ॥
.
हे मन ! विश्व के स्वामी निरंजन राजा राम की अपने चित्त से सेवा कर । जो आदि में सृष्टि को पैदा करते हैं और प्रलय में अपने स्वरूप में लीन कर लेते हैं । आकाश में सूर्य चन्द्र तारे नक्षत्र आदि अनन्त सृष्टि को निराधार ही अपनी माया रूप शक्ति से धारण कर रखा है और वह प्रभु सब प्राणियों के अन्दर स्थित हैं ।
.
पाताल में वासुकि नाम वाला सर्प हजार मुख वाले शेष जी दो हजार जिव्हा से दिन-रात उसको जपते हैं परन्तु उनके अनन्त गुणों को न ही जान सके । जो अनन्त के गुणों को जानने की चेष्टा करता है वह बाल बुद्धि है । अनन्त देवता मनुष्य और करोड़ों मुनि लोग जिसका ध्यान करते हुए भी उसके पारापार को नहीं जान सके । मेरा शरीर तो उसी राम का है जिसकी सब लोग निरन्तर उपासना करते हैं ।
.
अध्यात्मरामायण में कहा है कि –
मैं प्रकाश रूप अजन्मा अद्वितीय निरन्तर भासमान निर्मल विशुद्ध विज्ञान धन निरामय क्रिया रहित और एक मात्र आनन्द स्वरूप हूं । मैं सदा ही मुक्त अचिन्त्यशक्ति अतीन्द्रिय ज्ञान स्वरूप अविकृत रूप और अनन्त पार हूं । वेदवादी पंडित जन अहर्निश मेरा हृदय में चिन्तन करते हैं । इस प्रकार आत्मा का अखण्ड वृत्ति से चिन्तन करने वाले पुरुष के अन्तःकरण में उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादि के सहित अविद्या का नाश कर देती है ।
.
जैसे नियमानुसार से बनाई गई औषधि रोग को नष्ट कर देती है । साधक को चाहिये कि एकान्त देश में इन्द्रियों को विषय से हटाकर अन्तःकरण को अपने अधीन करके तथा आत्मा में स्थित होकर किसी साधन का आश्रय न लेकर केवल ज्ञान दृष्टि से एक आत्मा की ही भावना करे । यह विश्व परमात्मस्वरूप है ऐसा समझकर इन सबके कारण रूप आत्मा में लीन करे । इस तरह संपूर्ण चिदानन्दमयास्वरूप में स्थित हो जाता है तब उसे बाह्य आन्तर किसी वस्तु का ज्ञान नहीं रहता ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें