बुधवार, 3 अगस्त 2022

*श्री रज्जबवाणी पद ~ ४८*

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*दादू सुध बुध आत्मा, सतगुरु परसे आइ ।*
*दादू भृंगी कीट ज्यों, देखत ही ह्वै जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गौड़ी । (गायन समय २ से ६ दिन में)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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४८ सदगुरु प्रभाव । कहरवा
गुरु प्रसाद अगम गति पावै, पलटे जीव ब्रह्म ह्वै आवै ॥टेक॥
हरि भृंगी गुरु डंक समान, मारत तन्मय१ भये जु प्रान ॥१॥
चंदन राम सु गुरु गति वास, भेदै२ भेद नहीं वन दास ॥२॥
ब्रह्म सूर गुरु किरण प्रकाश, रज्जब जिव जल परसि३ आकाश ॥३॥१॥
सदगुरु का प्रभाव बता रहे हैं -
✦ गुरु के कृपा प्रसाद से जीव अगम ब्रह्म में जाने की योग्यता प्राप्त करता है । जीव भाव से बदल कर ब्रह्म हो जाता है ।
✦ हरि भृंगी के समान हैं, गुरु भृंगी के डंक के समान हैं । जैसे भृंगी का डंक लगने से कीट बदल कर भृंगी बन जाता है, वैसै ही गुरु के उपदेश से जीव हरि रूप१ ही हो जाता है ।
✦ राम चंदन के समान हैं, सुगुरु चंदन की सुगंध के समान हैं । जैसे चंदन की सुगंध से विद्ध होकर वन के वृक्ष चंदन हो जातै हैं, वैसे ही गुरु के उपदेश से विद्ध२ होकर दास राम रूप हो जाता है, राम समान उसका भेद नहीं रहता ।
✦ ब्रह्म सूर्य के समान हैं, गुरु उसकी किरण के समान है । जैसे सूर्य किरण के स्पर्श३ से जल आकाश हो जाता है, वैसे ही गुरु के ज्ञान प्रकाश से मुक्त होकर जीव ब्रह्म स्वरूप में लय हो जाता है ।
(क्रमशः)

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