शनिवार, 13 अगस्त 2022

*वल्लभाचार्य की पद्य टीका*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*रूख वृक्ष वनराइ सब, चंदन पासैं होइ ।*
*दादू बास लगाइ कर, किये सुगन्धे सोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधू का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*वल्लभाचार्य की पद्य टीका*
*इन्दव*
*मूरति पूजन भाव घनूं१ उर,*
*यो मन में सब ही जन दीजे।*
*वैहि करी हरि धामन धामन,*
*सेवत है सुख आँखिन लीजे ॥*
*है सुघुराई२ अवद्धि महा नित,*
*राग रु भोग बहौ विधि कीजे।*
*नाम सु वल्लभ३ रीति सबै पृथु,*
*गोकुल गांव सु देख तरीजे ॥२५९॥*
वल्लभाचार्य जी के हृदय में मूर्तिपूजन का भाव अत्यधिक१ था। आपके मन में ऐसी इच्छा रहती थी कि सभी जनों को मूर्ति पूजन करना चाहिये।
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उनकी इच्छा पूर्ण करने के लिये हरि ने वैसा ही कर दिया था। आपके भक्तों के घर-घर में भगवत् मूर्ति की सेवा-पूजा होती हुई देखकर आप उसका आनन्द प्राप्त करते थे। आप भगवान् की मूर्ति पूजा सम्बन्धी चतुराई२ के तो महान् अवधि रूप ही थे।
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प्रतिदिन राग और भोग बहुत प्रकार से करते थे। अर्थात् विविध रागें भगवान् के आगे गाई जाती थीं और विविध प्रकार के भोग लगाते थे। आपको भगवान् का नाम अति प्रिय३ लगता था।
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आपकी पूजापद्धति महाराज पृथुजी की सी थी। गोकुल गाँव में आने वाले भक्त और संत आपका दर्शन करके दुःख से पार होकर परमानन्द को प्राप्त होते थे।
(क्रमशः)

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