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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२५. सबद कौ अंग ~ १३/१६*
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नौबत नांउ निसांण९ हरि, साध सुणैं सुख होइ ।
कहि जगजीवन रांम धरि, अनभै अनहद जोइ ॥१३॥
{९. निसांण-निसान(डंका या नगाडा)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु नाम के नगाड़े से निकले स्वर को सुन साधु जन प्रसन्न होते हैं । वे राम नाम को ही अपने अनुभव से अनहद नाद से जोड़ लेते हैं ।
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ए नौबत अंब अंबु१० की, उपजै मांहि उपाधि११ ।
कहि जगजीवन सहज घर, सबद अनाहद साधि ॥१४॥
(१०. अंबु-जल) (११. उपाधि-रोग, दोष, विकार)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीवन के नगाड़े जल तत्व से हैं जिसे जीव की उपाधि या नाम दिया गया । संत कहते हैं कि प्रभु का घल सहज है । हे जीवात्मा वहां ही राम नाम का अनहद अभ्यास करें ।
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सुरतैं साधै सबद का, अस्थल१२ आतम भेव ।
जगजीवन तहँ रहि रह्या, अलख निरंजन देव ॥१५॥
{१२. अस्थल-स्थल(=स्थान)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ध्यान द्वारा प्रभु या राम नाम को साधो, साधना करो जिसका स्थल आत्मा हो । वहां ही प्रभु विराजते हैं ।
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सकल पसारा१३ सबद का, सबद तुम्हारा सार ।
जगजीवन हरि हेत करि, आप लिया सिर भार१४ ॥१६॥
(१३. पसारा=विस्तार) (१४. भार=१. उत्तरदायित्व, २. बोझ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सारी सृष्टि प्रभु नाम शब्द से ही है । और हे प्रभु जी आपका नाम ही सार रुप है । संत कहते हैं कि हे प्रभु जी आपने दया करके ही यह दायित्व स्वयं वहन किया है और नाम का दान दिया है ।
(क्रमशः)

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