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*है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ ।*
*हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*दे पहरावनि गांव समूह हिं,*
*कंचन रूपक१ पाथर आये।*
*एक रही उन भूल लिखी नहिं,*
*भौत२ लिखे जित भूल हु जाये ॥*
*जाय सुता विनवै पितु दें इन,*
*देत उनै हरि पै मँगवाये।*
*मात नहीं तन मांहि सुता लख,*
*तात हि ख्याल३ सबै विसराये ॥२९६॥*
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नरसीजी ने संपूर्ण ग्राम के लोगों को वस्त्र आभूषण पहनाये और एक स्वर्ण का तथा एक चांदी१ का पत्थर भी पत्र में लिखे अनुसार दिया।
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उस ग्राम की एक स्त्री भूल से पत्र में नहीं लिखी गई थी। जहाँ बहुतों२ के नाम लिखे जाते हैं वहाँ भूल भी हो ही जाती है। वह आकर कहने लगी कि- "जिससे सबको मिला है उसी के हाथों से मैं भी लूंगी।"
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पुत्री ने आकर नरसीजी से प्रार्थना की कि- "इसको मँगवा दीजिये, जिससे मेरी लाज रह जाय।" नरसीजी ने फिर प्रभु का स्मरण करके वस्त्र भूषण मँगवाये और उसको भी दिये।
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नरसीजी की पुत्री अपने पिता का यह प्रभाव देखकर अपने तन में भी आनन्द से फूली नहीं समा रही थी। वह अपने पिता के प्रभाव का ध्यान३ करके पति आदि सब को त्याग कर पिता के साथ ही जूनागढ़ आ गई ॥
(क्रमशः)

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