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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२७. सूरातन कौ अंग ७६/७८*
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राइ९ बमेक१० सिर छत्र धरि, अस्व११ दसहरा पूज१२ ।
कहि जगजीवन उबरती, मोह मींर सों झूझ१३ ॥७६॥
{९. राइ=उत्तम राजा(साधक) को} (१०. बमेक=विवेक)
(११. अस्त्र=अश्वसेना के साथ) (१२. दसहरा पूजा=विजय दशमी की पूजा) (१३. मोह मींर सौं झूझ=मोह रूप प्रबल शत्रु से युद्ध करना चाहिये)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो श्रेष्ठ नृप विवेक रुपी अश्व सेना के साथ अपनी विजय दश्मी पूजा करते हैं वे ही सच में मोह रुपी प्रबल शत्रु को जीत कर सच्चा दशहरा मनाते हैं ।
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कम धन सोइ के काम सों, झूंझ करै मन जीति ।
कहि जगजीवन नीति गहि, त्यागै आंन अनीति ॥७७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि धन कम होने पर भी जिन्हें कोइ फर्क नहीं पड़ता वे मन से धनी होते हुये झूझ कर मन जीतते हैं । वे ही अनीति त्याग कर त्याग मय जीवन जीते हैं ।
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दिन दिनकर की साहिबी, सब कोइ सूर कहाइ ।
कहि जगजीवन छत्र सिर, जा कै रांम सहाइ ॥७८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि दिन में सूर्य भगवान का भरोसा जो रखते हैं वे ही वीर कहाते हैं । जिन्हें राम जी का ही आसरा है वे ही नृप हैं ।
इति सूरातन कौ अंग संपूर्ण ॥२७॥
(क्रमशः)

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