शुक्रवार, 30 दिसंबर 2022

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*दादू सतगुरु अंजन बाहिकर, नैन पटल सब खोले ।*
*बहरे कानों सुणने लागे, गूंगे मुख सौं बोले ॥*
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साभार : @Subhash Jain
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एक अंधे आदमी को उसके मित्रों ने दावत दी थी। बहुत मिष्ठान्न बनाए थे। उसने मिठाइयां खाकर पूछाः किससे बनी हैं, कैसे बनी हैं, क्या है वह ? उसे मैं जानना चाहता हूं। मित्रों ने कहाः दूध से बनी हैं ये मिठाइयां। उस अंधे आदमी ने कहाः दूध कैसा होता है, कैसा है उसका रंग ? नासमझ होंगे मित्र। अंधे का पूछना तो उचित था, जिज्ञासा ठीक थी। एक मित्र ने कहाः सफेद, शुभ्र। उस अंधे आदमी ने पूछाः शुभ्र क्या होता है, सफेद क्या होता है ?
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उसे तो किसी रंग का, कोई प्रकाश का कभी कोई अनुभव नहीं था। उसकी तो आंखें बंद थीं। शुभ्र और सफेद शब्द मात्र थे, इनसे कुछ भी स्पष्ट न होता था। आंख वाले मित्रों में से एक ने कहाः बगुला देखा है ? बगुला के पंखों जैसा सफेद होता है दूध। उस अंधे आदमी ने कहाः पहेलियों पर पहेलियां पैदा कर रहे हैं आप। मुझे दूध का ही पता नहीं है, अब यह बगुला क्या होता है और यह बगुले का रंग कैसा होता है ? यह और एक कठिनाई हो गई, तो पहले कृपा करके बगुले के संबंध में समझा दें, फिर मैं दूध के संबंध में भी समझ लूंगा।
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पिछला प्रश्न अपनी जगह खड़ा रहा, समझाने की कोशिश ने नया प्रश्न खड़ा कर दिया, और समझाने की कोशिश और नया प्रश्न खड़ा कर देगी। पांच हजार सालों से दार्शनिक समझाते जाते हैं, उनके हर समझाने की कोशिश नये प्रश्न खड़े कर देती है, पुराने प्रश्न अपनी जगह मौजूद हैं। उनमें कोई अंतर नहीं पड़ता,नये प्रश्न खड़े करते जाते हैं।
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बट्र्रेंड रसेल ने पीछे एक जगह कहा कि पहले जब मैं बच्चा था, तो मैं सोचता थाः फिलासफी ने, दर्शन ने, दार्शनिकों ने, विचारकों ने, दुनिया के प्रश्न हल किए हैं।अब जब मैं बूढ़ा हो गया हूं, तो मैं समझता हूं, उन्होंने केवल नये प्रश्न खड़े किए हैं, क्योंकि पुराने प्रश्न तो अपनी जगह खड़े हुए हैं। कोई प्रश्न आज तक, कोई दार्शनिक हल नहीं कर पाया है। प्रश्न अपनी जगह खड़ा है, उसने जो उत्तर दिया है, उससे नये प्रश्न जरूर खड़े हो गए हैं।
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उस अंधे आदमी की भी वही मुश्किल हो गई। लेकिन मित्र समझाने के पीछे दीवाने थे, उन्हें इसकी फिकर ही न थी कि आदमी अंधा है। उन्हें अपने समझाने की फिकर थी, उनको अपना रस आ रहा था समझाने का। उन्हें समझा कर छोड़ना था। एक आदमी ने उस अंधे की बगल में हाथ किया और कहाः मेरे हाथ पर हाथ फेरो। जैसा मेरा हाथ तुम्हें लंबा और सुडौल मालूम पड़ता है, ऐसे ही बगुले की गर्दन होती है। थोड़ा-बहुत तो इससे तुम्हें बगुले की समझ आ ही जाएगी।
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उस आदमी ने उसके हाथ पर हाथ फेरा और वह खुशी से नाच उठा। और उसने कहाः मैं समझ गया, दूध कैसा होता है। आदमी के हाथ की तरह दूध होता है। ठीक है उसकी समझ। दूध के लिए प्रश्न उठा था। यह सारी कथा से इस सारे अनुमान से, उस अंधे आदमी ने निष्कर्ष निकाला कि दूध आदमी के झुके हुए हाथ की तरह होता है।
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ईश्वर के संबंध में हमारे सब निष्कर्ष ऐसे ही हैं। और चूंकि अलग-अलग मुल्कों में अंधों ने अलग-अलग निष्कर्ष ले लिए हैं, तो किन्हीं अंधों ने मस्जिद बना ली है, किन्हीं अंधों ने मंदिर, किसी ने भगवान की एक शक्ल, किसी ने दूसरी, क्योंकि किसी को बगुले की तरह समझ में आया है, किसी को किसी और तरह समझाया गया है। और फिर इन अंधों ने हद कर दी आखिर में, न केवल यह कहते हैं कि दूध झुके हुए हाथ की तरह होता है, बल्कि यह भी कहते हैं कि अगर कोई और तरह के दूध को मानता है, तो हम हत्या कर देंगे, वह गलत बात कहता है।
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तो फिर उन अंधों ने सारी दुनिया में उपद्रव किए हैं। धर्म के नाम पर जो उपद्रव हुए हैं, वे अंधे आदमियों के उपद्रव हैं। नहीं तो धर्म के नाम पर उपद्रव हो सकते हैं ? धर्म के नाम पर हत्याएं हो सकती हैं ? धर्म के नाम पर मकान और मंदिर जलाए जा सकते हैं ? और बच्चे और औरतें मारी जा सकती हैं ? धर्म के नाम पर खून हो सकता है ? निश्चित ही धर्म के नाम पर कुछ अंधे लोग काम कर रहे होंगे, अन्यथा धर्म के नाम पर यह सब-कुछ कैसे हो सकता है।
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पिछले मनुष्य-जाति के धर्मों का इतिहास, अंधों की लड़ाइयों का इतिहास है। और हम आज भी यही पूछते चले जा रहे हैं, कैसे विश्वास करें, विश्वास करेंगे तो अंधे हो जाएंगे। विश्वास का सवाल नहीं है।उस अंधे आदमी के मित्रों में अगर मैं भी रहा होता, तो मैं उसको दूध को समझाने की कोशिश न करता। मैं उस आदमी को कहताः यह प्रश्न तुम्हारा गलत है। वह जिसके पास आंख नहीं है, वह प्रकाश, रंग और रूप के संबंध में प्रश्न करे, यह व्यर्थ है। तुम्हें इसके संबंध में प्रश्न नहीं, तुम्हें पूछना चाहिए कि मेरी आंख कैसे ठीक हो सकती है ?
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वह तुम्हारा ठीक प्रश्न होगा, वह राइट क्वेश्चन होगा। और तब मैं तुम्हें उत्तर नहीं दूंगा, ले चलूंगा किसी चिकित्सक के पास कि तुम्हारी आंख का इलाज हो,तुम्हारी आंख का उपचार हो। जिस दिन तुम्हारी आंख ठीक हो सकेगी, उस दिन तुम जान सकोगे कि प्रकाश कैसा है, दूध कैसा है, रंग कैसे हैं, रूप कैसे हैं।
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उस दिन बिना किसी के समझाए तुम देख सकोगे और जब तक तुम समझाए हुए को मानोगे, तब तक तुम्हारे अनुमान बहुत असंगत, बहुत काल्पनिक, बहुत झूठे होने वाले हैं, और उन अनुमानों पर अगर तुम रुक गए, तो शायद तुम्हारी अपनी आंख खोलने की जो पीड़ा और खोज होनी चाहिए, वह समाप्त हो जाएगी।
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वह अंधा आदमी नाच उठा था खुशी से कि मैंने जान लिया है कि दूध कैसा है। अब, अब उसे आंख की खोज का कोई सवाल ही न रहा। बिना आंख के ही दूध जान लिया गया है। अगर उसे यह अनुभव होता कि बिना आंख के दूध नहीं जाना जा सकता, शायद यह पीड़ा कि मैं जानना चाहता हूं, उसे अपनी आंख की चिकित्सा में ले गई होती।
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मैं आपसे कहना चाहता हूं कि विश्वास मत करें, ताकि आप अपनी आत्मा की चिकित्सा में जा सकें। विश्वास मत करें, ताकि आप अपनी भीतर की आंखों को खोलने के प्रति आतुर हो सकें, व्याकुल हो सकें। जो विश्वास कर लेगा, उसकी व्याकुलता समाप्त हो जाएगी। इसलिए मैंने कहा कि विश्वास अंधा है। विश्वास नहीं, चाहिए अत्यंत सतेज विचार, चाहिए अत्यंत जागरूक चिंतन, चाहिए खोज, अनुसंधान, चाहिए इनक्वायरी। और ये जब किसी व्यक्ति में पैदा होनी शुरू होती हैं, तो उसके भीतर एक आलोक का रास्ता धीरे-धीरे खुलने लगता है।
ओशो

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