🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 *सत्यराम सा* 卐 🙏🌷
🌷🙏 *#संतटीलापदावली* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
=================
*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
===========
हीरा रे ए१ हीरा रे ।
साध सबद ए२ हीरा रे । कोई परिषै बीरा रे ॥टेक॥
मोल न तोल न पारा रे । आदि अंति थैं न्यारा रे ॥
सबदां नैं कोई गावै रे । महा परंम सुष पावै रे ॥
यां सबदां मैं रांम समायौ रे । साधां३ देषि र गायौ रे ॥
जो सबदां मांहिं समावै रे । टीला हरि दरस दिखावै रे ॥६॥
(पाठान्तर : १. ये, २. ये, ३. साधों)
.
ब्रह्मनिष्ठ साधुओं के शब्द = पद हीरे सदृश होते हैं । वस्तुतः हीरा निर्जीव होता है । किन्तु शब्द कानो में पड़ते ही श्रवणकर्ता को यथार्थ ज्ञान करा देते हैं । ये विवेक के दाता हैं । अतः ये निर्विवाद रूप से हीरे से भी उच्चकोटि के मूल्यवान हीरे हैं । इन शब्दों का वास्तविक मरम कोई यथार्थ आत्मजिज्ञासु ही जान पाता है ॥टेक॥
.
न इनका मूल्य न कोई इनकी तुल्यता और न इनका अन्त ही है । ये आदि और अन्त से अतीत हैं । जो कोई इन शब्दों को गाता है यह आत्मानन्दरूप परमसुख को प्राप्त कर लेता है ।
.
इन शब्दों में स्वयं राम समाया हुआ है क्योंकि साधुओं ने उस राम का साक्षात्कार करके ही इनका गायन किया है । जो इन शब्दों में समाविष्ट हो जाता है, इनसे एकाकार हो जाता है, टीला कहता है परात्पर-परब्रह्म हरि उसको अपना दीदार देता है ॥६॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें