शनिवार, 31 दिसंबर 2022

शब्दस्कन्ध ~ पद #२७८

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #२७८)*
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*२७८. ब्रह्मयोग ताल*
*जाइ रे तन जाइ रे ।*
*जन्म सुफल कर लेहु राम रमि, सुमिर सुमिर गुण गाइ रे ॥टेक॥*
*नर नारायण सकल शिरोमणि, जनम अमोलक आइ रे ।*
*सो तन जाइ जगत नहिं जानै, सकै तो ठाहर लाइ रे ॥१॥*
*जरा काल दिन जाइ गरासै, तासौं कुछ न बसाइ रे ।*
*छिन छिन छीजत जाइ मुग्ध नर, अंत काल दिन आइ रे ॥२॥*
*प्रेम भगति, साधु की संगति, नाम निरंतर गाइ रे ।*
*जे सिर भाग तो सौंज सुफल कर, दादू विलम्ब न लाइ रे ॥३॥*
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भादी• - अस्य शरीस्य श्वासोच्छवासौ विषयासक्तमना त्वं व्यर्थमेव हापयसि । पुनःपुनः खोज्यमानोऽपि न त्वं बुद्धो भवति । अतो भगवतो गुणगानेन तस्मिन्नेव रममाणोस्त्वं तव जन्म साफल्य कुरु । अमूल्योऽये नरदेहो नारायणप्राप्त्यर्थमेव त्वया प्राप्तः । तादृशोऽमूल्यनिधिस्तव विषयभोगेषु व्यर्थमेव क्षीयते नहि संसारिणो जानन्त्यमूल्योऽयं देह इति । अतएव प्रमाद्यन्ति । अतस्त्वं राधा-शक्ति-भजन कृत्वा स्वस्वरूपे ब्रह्मणि स्थिति प्राप्नुहि । तब वार्धक्यं तु सततं वर्धते नदी देश इव । कालोऽष्ययं निठुर आयुष्यं कृन्तति । न ते निवारयितुं शक्नोति कश्चित् अवश्य भावित्वात् ।
अवश्य भाविभावानां परिहारो न विद्यत इत्युक्तत्वात् । हे मूडनर ! क्षणे क्षणे शरीरमिदं क्षीयते इति त्वं किं न पश्यसि । सत्सङ्गतिद्वारा नित्यं भगवद्भजनेन भगवन्नामस्मरणेन च त्वं तव जन्म साकल्यं कुरुष्व । तदैव तव सौभाग्यमुदेष्यति । अन्यथा तु तव जन्मैव निष्कलं भवेत् । न हास्मिन् कायों विलम्बावसरः ।
उक्तं हि भागवते-
नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानहते विड्भुजा ये ।
तपोदिव्यं पुत्र कायेन सत्वं शुद्ध येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं ।
त्वनन्तम् यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुषं द्विषते नरः ।
घर्मावमन्ता कामात्मा भवेत्स खलु वञ्चते॥
प्रियमाणैरभिध्येयो यो परमेश्वरः ।
आत्मभावं नयत्यङ्ग सर्वात्मा सर्वसंश्रयः ॥
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इस मानव शरीर के श्वास प्रश्वासों को विषयों में आसक्त मन के द्वारा व्यर्थ में ही गंवा दिये । बार बार सावधान करने पर भी तू नहीं जागा । अब भगवान् के गुणानुवाद करके उसी में रमता हुआ अपने जन्म को सफल बनाले । यह नरशरीर अमूल्य है ।
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नारायण की प्राप्ति का साधन है । ऐसी अमूल्य निधि को तू प्रमाद में खो रहा है । तुम यथाशक्ति भजन करके अपने स्वरूप ब्रह्म में लीन होने के लिये इस शरीर का उपयोग करो । तेरी वृद्धावस्था भी आ गई, काल भी समीप ही है ।
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इन दोनों का कोई निवारण भी नहीं कर सकता क्योंकि ये दोनों शरीर के अवश्य होने वाले धर्म हैं । सत्संगति द्वारा भगवान् का नाम स्मरण से तू अपने जन्म को सफल बना, तब ही तू भाग्यशाली माना जायगा । अन्यथा तो तेरा जन्म निष्फल ही है । अब इस कार्य में विलम्ब मत आकर ।
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श्रीभागवत में –
पुत्रो ! इस मृत्यु-लोक में यह मनुष्य शरीर दुःखमय विषय-भोग के लिये ही नहीं है । यह भोग तो विष्ठा-भोगी सूकर, कूकर आदि को भी मिलते ही हैं । इस शरीर से तो दिव्य तप ही करना चाहिये । जिससे तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हो । इसीसे ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होती है ।
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जो परम दुर्लभ मानव शरीर पाकर भी काम-परायण होकर दूसरों से द्वेष करता है और धर्म की अवहेलना करता है, वह महान् लाभ से वंचित रह जाता है । जो लोग मृत्यु के निकट पहुँच रहे हैं, उन्हें सब प्रकार से भगवान् का ही ध्यान करना चाहिये । हे परीक्षित् ! सबके परम आश्रय सर्वात्मा भगवान् अपने ध्यान करने वाले को अपने स्वरूप में लीन कर लेते हैं ।
(क्रमशः)

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