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*दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ ।*
*सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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बाजीगर कौ आवै हासौ ।
जिहि यहु कीयौ बड़ौ तमासौ ॥टेक॥
बाजीगर कलधरी बणाई ।
आपैं बाजी होती जाई ॥
नांनां बिधि बाजी यहु फूली ।
ताकूं१ देषि दुनीं सब भूली ॥
इहिं बाजी सब जीव नचाया ।
भांनैं घड़ै सु नजरि न आया ॥
बाजीगर अन्तरगति रहै ।
मांहै बैठौ सब कुछ कहै ॥
टीला बाजीगर सूं लागै ।
तौ इहिं बाजी सूं२ मन भागै ॥११॥
(पाठान्तर : १. ताकौं, २. सौं)
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जिस बाजीगर ने सृष्टि रूपी विशाल तमाशे का निर्माण किया है, उसी बाजीगर का समय आने पर विनष्ट करने के लिए हासौ = हशिया(हाथ से वार करने में काम आने वाला कुल्हाड़े जैसा हथियार) भी आता है ॥टेक॥
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बाजीगर रूप परब्रह्म-परमात्मा ने एक बार कलधरी = सृष्टि का निर्माण कर दिया । उसके पश्चात् यह सृष्टि अपने आप उत्पन्न और विनष्ट होती जाती है । यह सृष्टि नाना प्रकार से फलती-फूलती है अर्थात् यह ८४ लाख प्रकार के चराचर से परिपूर्ण होती है । मनुष्य इस नानाविध सृष्टि को देखकर इसमें विमुग्ध हो जाता है और अपने निजस्वरूपभूत परब्रह्म-परमात्मा को भूल जाता है ।
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इस सृष्टि रूप माया ने ही सारे जीवों को भ्रमा रखा है । इसी के कारण जीव पुनः पुनः जन्म धारण करता और मरता है । किन्तु जो इस सृष्टि का निर्माण और संहार करता है वह परमात्मा माया से भ्रमित जीवों को नजर नहीं आता ।
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वस्तुतः सृष्टि-निर्माण परमात्मा हृदेश में निवास करता है । वह भीतर बैठा-बैठा ही सब कुछ करता है, सब पर शासन करता है और सब कुछ कहता = सुनता है । टीला कहता है, यदि कोई बाजीगर रूप परमात्मा से अपना सुदृढ़ सम्बन्ध जोड़ ले तो उसका मन इस विनाशशील सृष्टि से सर्वथा रागमुक्त हो जाए ॥११॥
(क्रमशः)

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