शुक्रवार, 13 जनवरी 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #२८३

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #२८३)*
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*२८३. आत्म समता । उत्सव ताल*
*ऐसे बाबा राम रमीजे, आतम सौं अंतर नहीं कीजे ॥टेक॥*
*जैसे आतम आपा लेखै, जीव जंतु ऐसे कर पेखै ॥१॥*
*एक राम ऐसे कर जानै, आपा पर अंतर नहिं आनै ॥२॥*
*सब घट आतम एक विचारे, राम सनेही प्राण हमारे ॥३॥*
*दादू साची राम सगाई, ऐसा भाव हमारे भाई ॥४॥*
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भादी०-रामभक्तो रामं चिन्तयन् सर्वत्र सर्वं राममयं पश्यति न तु भिन्नम् । अविद्यात त्कार्यनिवृत्त्या सर्वत्र ब्रह्मसुखमनुभवति । किन्तु सर्वभूतेषु भोक्तृतया स्थितमात्मानं विभुं पश्यति अर्थात् आत्यवत्सर्वभूतानि पश्यति । सर्वभूतस्थितमेकमेव रामं सर्वेषु समानं मत्वा न कंचिद् द्वेष्टि न च कमपि निन्दति । किन्तु सर्वैः सह समानव्यवहारं करोति । स सर्वात्मैकत्वदर्शी सम्यक्दर्शी योगी वति । एतादृश: सम्यक्दर्शी योगी रामभक्तो मम प्रियोऽस्ति ।

उक्तं हि गीतायाम्-
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
आत्थ्यौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥

वासिष्ठेऽपि-
शीणाभ्यां सुख-दुःखाभ्यां हेयोपादेययो: क्षये ।
इप्सितानीप्लते कस्तो गलितेऽथ शुभाशुभे॥
आमूलान्मनसि क्षीणे संकल्पस्य कथा च का ।
तिलेष्विवातिदग्धेषु तैलस्य कलना कुतः ॥
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राम का भक्त का चिन्तन करता हुआ सब जगह पर राम को ही देखता है । अविद्या और उसके कार्य की निवृत्ति हो जाने से सर्वत्र उसको सुखरूप ब्रह्म ही भासता है । सब भूतों में भोक्ता के रूप में स्थित एक व्यापक आत्मा को ही देखता है । सब प्राणियों को अपनी तरह से देखता है ।
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अर्थात् जैसे मुझे सुख अभीष्ट और दुःख अनिष्ट है उसी प्रकार सभी प्राणियों को भी सुख-दुःख, प्रतिकूल-अनुकूल, इष्ट, अनिष्ट रूप से देखते हैं । आत्मा की समता होने के कारण सबको समान ही देखता है । सब प्राणियों में एक राम को देखता हुआ न द्वेष, न निंदा करता किन्तु सबके साथ समान ही व्यवहार करता है । ऐसा सर्वात्मैकदर्शी सम्यक्दर्शी योगी कहलाता है । इस प्रकार राम को जानने वाला मुझे प्रिय है ।
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गीता में कहा है कि –
सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थित रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को संपूर्ण भूतों में स्थित और संपूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है । हे अर्जुन ! जो योगी अपनी ही तरह संपूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख-दुःख को भी सम ही देखता है वह योगी श्रेष्ठ माना जाता है ।
(क्रमशः)

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