सोमवार, 2 जनवरी 2023

*२८. काल कौ अंग १/४*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग १/४*
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आगै पीछै जाहिं सब, बूढै१ तरणै बाल१ ।
जगजीवन जनमै मरै. फिर फिर ग्रासै का॥१॥
(१. बूढै तरणै बाल=वृद्ध, युवक, बालक)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब को संसार से पलायन करना है चाहे वह बूढा हो, तरुण यानि जवान हो, या बालक हो, यह जनम मरण का चक्र चलता रहता है हर कोइ आज नहीं तो कल काल ग्रसित होता ही है ।
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जोरा२ कै बस जीव सब, कहँ राजा कहँ रंक ।
जगजीवन जम ग्रासतां, नेक न मांनै संक३ ॥२॥
२. जोरा-बलवान् । ३. संक-शंका, सन्देह ।
संतजगजीवन जी कहते हैं कि काल बली के वश में सब रहते हैं । चाहे वह राजा हो या रंक । काल ग्रसते समय जरा भी झिझकता नहीं है ।
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निस दिन जोरो दिन गिणै, जीव न जांणै अंध ।
जगजीवन जे कछु करि, रांम बिना सब धंध ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यम बली नित्य जीव के दिन गिनता है और जीव अज्ञान अंधता में पहचानता ही नहीं है । संत कहते हैं कि जीव प्रभु के बिना जो कुछ करता है वह सब व्यर्थ है ।
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जौरो जीव क्यूं लागणै, ते क्यूं खरचै दांम ।
जगजीवन बाक़ी रही, लूटि लिया धन ठांम ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं जीव के पीछे जम क्यों लगा है ? और जीव क्यों अपनी सांसो रुपी पूंजी खर्च रहा है । और जो शेष है वह भी लूट रहा है ।
(क्रमशः)

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