शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

*आय हरी जन हार गहायो*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*करणहार कर्त्ता पुरुष, हमको कैसी चिंत ।*
*सब काहू की करत है, सो दादू का दादू मिंत ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*साह के राग धर्यो गहनै,*
*नरसी करि रूप सु जाय छुड़ायो ।*
*गोद हि नाखि दिया वह कागद,*
*आय हरी जन हार गहायो ।*
*शब्द हुयो जयकार सभा मधि,*
*भूप पर्यो पग भाव सवायो ।*
*दुष्ट गये मुरझाय नये नहिं,*
*राम दया बिन पंथ न पायो ॥३०४॥*
नरसी ने सन्त-सेवा के लिए कुछ द्रव्य लेकर केदार राग सेठ के यहाँ गहणे रख दिया था। इसलिए भगवान् ने नरसी का रूप धारण किया और सेठ ने यहाँ जाकर तथा रुपये देकर केदार राग छुड़ा लिया।
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फिर गिरवी पत्र लाकर प्रभु ने नरसी के गोद में डाल दिया। उस पत्र को देखकर नरसीजी जान गये कि प्रभु ने केदार राग छुड़ा लिया है। इससे हर्षित होकर केदार गाने लगे। और दिन तो माला टूट ही पड़ती थी किन्तु आज तो प्रभु की मूर्ति ने स्वयं चलकर भक्त नरसी को पुष्प हार ग्रहण कराया अर्थात् पहनाया-
"नरसिंहिं दीन्ही रीझि के, माला नन्द कुमार।
राखि लियो अपनी शरण, विमुखिनि मुख दे छार"॥
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यह देखकर सभा के मध्य भक्तों ने जय घोष करते हुये धन्य धन्य कहा। राजा नरसी के चरणों में पड़ गया तथा उसके हृदय में नरसी और भगवान् संबंधी भाव सवाया हो गया।
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अभागे दुष्ट लोग लज्जित होकर वहाँ से चुपचाप ऐसे चले गये कि नरसीजी तथा प्रभु को प्रणाम भी नहीं किया। ठीक है, राम कृपा बिना भक्ति रूप मार्ग किसी ने भी नहीं पाया है। तब हरिविमुख दुष्टजन कैसे भक्त और भगवान् को प्रणाम करते !
(क्रमशः)

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