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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग २९/३२*
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कुम्भकरण रावण अहिरावण, लंका से गढ़ कोट ।
जगजीवन इक रांम बिन, ढ़हे काल की चोट ॥२९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कुम्भकरण, रावण, अहिरावण जैसे योद्धा व लंका जैसे किले जब ढह गये क्योंकि इनमें प्रभुनाम की महिमा नहीं थी एक प्रभु का नाम ही ऐसा है जो काल की चोट को पराजित कर सकता है ।
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कहि जगजीवन बीस भुज, दस मसतक जिहिं देह ।
ते पनि अबिगत रांम बिन, अंत मिलाई खेह७ ॥३०॥
(७. खेह=धूल, राख)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बीस भुजाओं व दस मस्तक युक्त होने पर भी राम विमुख होने से देह मिट्टी में ही मिल रही ।
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कलि के जोधा को दियो, थंभण मते अकास ।
रांम बिमुख लौकिक मत, सु कहि जगजीवनदास ॥३१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कलियुग के योद्धाओं या बलवान व्यक्ति को भी यदि आकाश थामने को दिया जाय तो वह सफल नहीं हो सकता है । क्योंकि यह सब कृत्य प्रभु के हैं । प्रभु विमुख कभी कुछ नहीं कर पाते संत कहते हैं यह ही लौकिक मत है ।
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जगजीवन इस ठौर ए, अस्थिर रहै न कोइ ।
बीस भुजा दस सीस था, ते पण बिनस्या लोइ८ ॥३२॥
{८. लोइ=लोग(प्राणी)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार में चंचल जीव कोइ भी स्थाइ नहीं रह सकता है । बीस भुजाएं व दश शीश वाले रावण को भी पलायन करना पड़ा ।
(क्रमशः)

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