गुरुवार, 19 जनवरी 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १०५*

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*दादू करणी हिन्दू तुरक की, अपनी अपनी ठौर ।*
*दुहुं बिच मारग साधु का, यहु संतों की रह और ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग टोडी । (गायन दिन ६ से १२)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१०५ निष्पक्षता । त्रिताल
यूं निर्पख मन१ भया हमारा, 
इन दोनों का देख पसारा२ ॥टेक॥
माला पहर्यों तसबी३ लागै, यासी४ हूं कछु नांही ।
ऐसे समझ तजे सब बंधन, क्या पहरै गल मांही ॥१॥
वरत कियों रोजे रिस माने, इन में कहां बड़ाई ।
ऐसे जानि तजे सब लंधन, संकट पाश छुड़ाई ॥२॥
देवल५ जाउं मसीत मरै जलि, या में क्या सिधि पाई ।
ऐसे समझ रहे दोनो सौं, उर अन्तर ल्यौ६ लाई ॥३॥
दाग देउ तो गोर गुमानणि७, गाड़े मान८ मसाणं ।
ऐसे जानि धर्या चौड़े में, दोनों रहे डिफाणं९ ॥४॥
एक हि तज्यो एक बल बाँधे, टलै न सौकि१० अड़ी ।
ऐसे समझ रहत जन रज्जब, दोनों त्याग खड़ी ॥५॥२२॥
अपनी निष्पक्षता दिखा रहे हैं -
✦ इन हिन्दू और मुसलमान दोनों का ही भ्रम विस्तार२ देखकर हमारा मन इस प्रकार निष्पक्ष१ हो गया है -
✦ माला पहनता हूं तो तसबीह३ वाले ईर्ष्या करने लगते हैं, इनसे४ कुछ भी नहीं होता, ऐसा समझकर सभी बंधन छोड़ दिये हैं, इनको गले में पहनने से क्या है ?
✦ व्रत करता हूं तो रोजा करने वाले क्रोध करते हैं इनके करने से बडाई भी क्या है ? ऐसा जान कर सब लंधन छोड़कर दु:ख की फाँसी को हटाया है ।
✦ मंदिर५ में जाता हूं तो मसजिद वाले जल मरते हैं, इनमें जाने वालों को क्या सिद्धि प्राप्त हुई है ? ऐसा समझ कर मंदिर मसजिद दोनों में जाना बंद करके, हृदय में में ही प्रभु से वृत्ति६लगता हूँ ।
✦ मुरदे को दाग देते हैं तो कब्र वाले अपने श्रेष्ठता७ का अभिमान करते हैं, गाड़ने से श्मशान में जलाने वाले अपनी श्रेष्ठता८ का अभिमान करते हैं । ऐसे जानकर हम शव को मैदान में ही रख देते हैं । यह देख दोनों चिल्लाने९ से रह जाते हैं ।
✦ एक को त्यागने से एक पक्ष जोर पकड़ती है, हटती नहीं, सौत१० के समान अड़ जाती है, ऐसे समझ कर हम निष्पक्ष रहते हैं । हमारी वृति हिन्द मुसलमान दोनों ही पक्ष को छोड़कर प्रभु में स्थित है ।
(क्रमशः)

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