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*काया के वश जीव है, कस कस बँध्या मांहि ।*
*दादू आत्मराम बिन, क्यों ही छूटै नांहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग टोडी । (गायन दिन ६ से १२)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१०२ त्रिताल
भय है रे मुझ भय है रे,
बाहर भीतर बैरी बैठे, जीव कहां ह्वै जै१ है रे ॥टेक॥
मानुष जन्म द्योस२ सोई बीतो, रैन३ परी तम४ मैं१७ है रे ।
जामण मरण खांहिं जिव गोते, दुस्तर५ आडी नै६ है रे ॥१॥
यम सु लुहार जीव लोहा, आपा अग्नि सु तै८ है रे ।
घट घट आरण९ सुरति१० संडासी, गुण घण मार सु दै११ है रे ॥२॥
चौरासी चौपड़ फिर आयो, अब देबे को पै१२ है रे ।
करनी हीन होत सोई काची, चोट चहूं दिशि खै१३ है रे ॥३॥
जुग जुग जीव काल को भक्षण, यम धाप्यो१४ नहिं धै१५ है रे ।
जन रज्जब यूं समझ सयाने, छूटन को हरि लै१६ है रे ॥४॥१९॥
✦ मुझे भय है, भय है, बाहर विषय रूप और भीतर कामादि रूप शत्रु आड़े बैठै हुये हैं जीव प्रभु के पास किस ओर से जाय१ ?
✦ मनुष्य जन्म रूप दिन२ बीत चुका है, आगे चोरासी लाख योनि रूप रात्रि पड़ी३ है, जो गहरे अज्ञान रूप अंधकार४ मय१७ है । जीव संसार सागर में जन्म मरण रूप गोते खा रहा है, संसार नीति६ रूप कठिन५ आड़ लगी है, जिससे बाहर नहीं निकल सकता ।
✦ यम लुहार है, जीव है सोई लोहा है, उसे उक्त लुहार अहंकार७ रूप अग्नि से तपा८ रहा है प्रति शरीर को विषय रूप अहरण९ पर रखकर वृत्ति१० रूप संडासी से पकड़ कर, गुण रूप घण की मार दे११ रहा है ।
✦ तू चौरासी लाख योनि रूप चौपड़ में घूम आया है, अब तुझ पर कौन चोट दे पायेगा१२ ? किंतु तेरे से जो नीच कर्म होते हैं वही तेरी कचाई है, उससे दशों दिशाओं में दु:ख रूप चोटें खाता१३ है ।
✦ प्रति युग में जीव काल का भोजन होता है किंतु यमराज अभी तक तृप्त१४ नहीं हुआ है और न तृप्त१५ होगा । हे चतुर ! ऐसा समझ कर अपने छुटकारे के लिये हरि में ही वृत्ति१६ लगा, यही छुटने का साधन है ।
(क्रमशः)

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