बुधवार, 11 जनवरी 2023

*२८. काल कौ अंग १७/२०*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग १७/२०*
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खांन१ खवास२ उमराव३ मींरा४, सूर सुभट सिरमौड़५ ।
जगजीवन इक रांम बिन, बादि मुवा करि दौड़ ॥१७॥
(१. खांन=स्वामी) (२. खवास=विशिष्ट जन) (३. उमराव=धनी सरदार) (४. मींरा=सरदार) (५. सिरमौड़=प्रधान)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बड़े बड़े-बड़े स्वामी, विशिष्ट जन, धनिक सरदार, सरदार व प्रधानजन भी बिना प्रभु के नाम के बिना अपने पद प्रतिष्ठा के लिये दौड़ दौड़ कर मर गये ।
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असपति गजपति नरपति, तेजाधारी६ मीर ।
जगजीवन इक रांम बिन, कोइ रहत न देख्या थीर ॥१८॥
(६. तेजाधारी=शस्त्रधारी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अश्वपति, गजपति, नृप, शस्त्रधारी यौद्धा सभी सरदार कोइ भी बिना प्रभु के नाम के धैर्य धारण नहीं कर पाते ।
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सुरपति नरपति फुनिगपति७, सुरग म्रित्यु पाताल ।
जगजीवन इक रांम बिन, हरि बिन बचै न काल८ ॥१९॥
(७. फुनिगपति=नागलोक के स्वामी) (८. काल=मृत्यु)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देवराज इन्द्र, राजा, नाग लोक के अधिपति, व स्वर्ग मृत्यु व पाताल लोक के स्वामी भी बिना प्रभु के नाम बिना काल से नहीं बच सकते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, सुरग म्रित्यु पाताल ।
सुरपति नरपति फुनिगपति७, हरि बिन बचै न काल ॥२०॥
(७. फुनिगपति=नागलोक के स्वामी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि, हे प्रभु स्वर्ग पाताल, मृत्यु लोक व उनके स्वामी इन्द्र, राजा, व नागलोक के स्वामी भी बिना प्रभु के नाम के काल से नहीं बच सके ।
(क्रमशः)

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