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*दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ ।*
*खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पारिख का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*ब्राह्मण जाय सिखावत भूपहिं,*
*हार पुयो कच ताग से टूट्यो ।*
*मात कहै सुत कान धरो मत,*
*रासज बान बुरी चलि छूटयो ।*
*देवल जाय रु पाट मँगावत,*
*बाँट गुह्यो१ गल नावत२ धूट्यो३ ।*
*गाय दिखावहु ख्याल हमें अब,*
*गावत राग दुति४ नहिं खूटयो५ ॥३०१॥*
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नरसीजी की प्रतिष्ठा से दुःखी होकर कुछ ब्राह्मणों ने राजा के पास जाकर उसे सिखाया कि- नरसीजी ने, मुझे भगवान् प्रसाद रूप में माला देते हैं, यह झूठा प्रचार अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये किया है। सच्ची बात तो यह है कि-कच्चे धागे से माला पिरोकर भगवान् के गले में पहना देता है। फिर गाने लगता है तब फूलों के भार से कच्चा धागा टूट जाता है। तब कहता है कि मुझे भगवान् ने दी है।
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राजा की माता हरिभक्त थी। उसने राजा को कहा-पुत्र तुम इन हरिविमुखों की बात मत सुना करो। तो भी राजा का तो रजोगुणी स्वभाव था, उसकी बुद्धि माया ने हर ली थी। इससे जिनने बुरी बात चलाई थी, उनकी ओर ही उसका मन उनके साथ ही चल पड़ा।
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राजा ने नरसीजी के मंदिर में जाकर रेशम मँगवाया, उसीकी डोरी अपने सामने बनवाई फिर उसमें माला पिरो१ कर भगवान् के गले में पहनाई२ और खूब खींच३ कर गले में बाँध दी।
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फिर नरसीजी को कहा— अब आप गाइये, अब यदि माला टूट पड़ेगी तो मुझे निश्चय होगा कि आपको प्रभु प्रसाद रूप में माला प्रदान करते हैं। नरसीजी ने केदार को छोड़कर अन्य४ रागों द्वारा हरि यश गाया किन्तु माला नहीं गिरी५ । कारण- वह केदार राग गाने से ही मिलती थी, केदार गिरवी रखी थी, गाते नहीं थे।
(क्रमशः)

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