शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

*२८. काल कौ अंग ३७/४०*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ३७/४०*
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अरथ द्रव्य यों ही रह्या, धन संच्या किहि कांम ।
जीव भया बस काल कै, जगजीवन तजि ठांम४ ॥३७॥
(४. तजि ठांम=प्रभु की सेवा त्याग कर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि धन, पदार्थ, सब यों ही धरे रह जाते हैं । धन संग्रह भी किसी काम नहीं आता । जीव काल के अधीन है उसे प्रभु की सेवा छोड़कर भी जाना पड़ता है ।
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अमर होंण की ए गली५, तन मन सौं ल्यौ लाइ ।
जगजीवन दूजी दिसा, काल रह्या मुंह बाइ ॥३८॥
(५. अमर होने का=सरल मार्ग है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में अमर होने का एक ही मार्ग है कि तन मन से प्रभु का ध्यान करें । संत कहते हैं कि अगर इसे छोड़कर दूसरी और ध्यान किया तो काल मुंह फाड़े खड़ा है ।
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कही जगजीवन चंद्रमा, कला खीण क्यूं होइ ।
उतपति प्रलै करम क्रित, अबिगत आग्या जोइ ॥३९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चंद्रमा भी कला सदा क्षीण क्यों होता है । क्योंकि उत्पत्ति प्रलय, कर्म, कृत्य सब प्रभु की आज्ञा से होता है ।
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कहि जगजीवन चंद्रमा, कला खींण क्यूं रांम ।
मार६ दहै, मारुत बहै, मोह तणै बसि धाम६ ॥४०॥
(६-६. कामाग्नि जला रही है, श्वास भजन के बिना व्यर्थ जा रहे हैं, चित्त मोहपाश में फंसा हुआ है; अतः यहीं उलझा रह गया वास्तविक स्थान पर नहीं पहुँच पाया)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि चंद्रमा कला से क्षीण क्यों होता है । क्योंकि जीव को कामाग्नि जला रही है । श्वास भजन बिना व्यर्थ जा रहे है । चित मोह से बंधा है । अतः यहीं उलझा रह गया वास्तविक स्थान तक नहीं पहुंच पाया यहां जीव की स्थिति चंद्रमा जैसी है ।
(क्रमशः)

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