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*दादू नैन न देखे नैन को, अन्तर भी कुछ नाहिं ।*
*सतगुरु दर्पण कर दिया, अरस परस मिलि माहिं ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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गुर बिन क्यूं गोब्यंद१ पाइये ।
जासूं२ मन चित हेत लगाइये ॥टेक॥
गुर बिन कोई न पावै बाट ।
क्यूं करि लंघै औघट घाट ॥
गुर बिन क्यूं करि लागै नेह ।
साहिबजी सूं३ अधिक सनेह ॥
गुर बिन क्यूं करि बंचै काल ।
साहिब संम्रथ होइ दयाल ॥
गुर दादू आगैं करि चाल ।
टीला साहिब करै निहाल ॥१७॥
(पाठान्तर : १. गोबिन्द, २. जासौं, ३. सौं)
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जिसमें मन और चित्त को लगाकर प्रीति की जा सके ऐसे गोविन्द को बिना गुरु के कैसे प्राप्त किया जा सकता है ॥टेक॥
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गुरु के बिना कोई भी रास्ता नहीं जान सकता और बिना सही रास्ता जाने संसार रूपी ऊबड़-खाबड़ कठिन राह को कैसे पार किया जा सकता है । बिना गुरु के परब्रह्म-परमात्मा से अनन्यप्रीति कैसे हो सकती है ।
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बिना गुरु के काल से कैसे बचा जा सकता है । काल से बचने का उपाय समर्थसाहिब = परब्रह्म-परमात्मा की प्रसन्नता है और परमात्मा की प्रसन्नता गुरुकृपा से प्राप्त होती है । टीला कहता है, गुरु महाराज दादूजी को आगे करके = उनकी शरण का आश्रय लेकर चल=साधना कर जिससे कि तुझको साहिब रूप परब्रह्म-परमात्मा निहाल=कृतार्थ कर दे ॥१७॥
(क्रमशः)
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