मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ ११४*

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*माया का ठाकुर किया, माया की महामाइ ।*
*ऐसे देव अनंत कर, सब जग पूजन जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गुंड(गौंड) ६ (गायन समय - वर्षा ॠतु सब समय)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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११४ झूठी सेवा । दादरा
नेह निरंजन सौं नहीं, सब अंजन ध्यावैं१ ।
बैयर२ से बैयर मिल्यों, सुत को नहिं पावैं ॥टेक॥
पारब्रह्म को पीठ दे, दिल देई३ देवा ।
माया सौं माया भजे, सब झूठी सेवा ॥१॥
गुण गहि गुण को पूजिये, तेती सब झूठी ।
जल बूड़त जल को गहै, मन मूरख मूठी ॥२॥
सकल विकल४ बाहर रहे, गुरु ज्ञान न पाया ।
जन रज्जब सोधी५ बिना, दह दिशि मन लाया ॥३॥८॥
सब लोग झूठी सेवा में लगे हैं, यह कह रहे हैं -
✦ सब लोग माया की ही उपासना१ करते हैं । निरंजन ब्रह्म से प्रेम नहीं करते । जैसे नारी२ से नारी मिलने पर पुत्र प्राप्त नहीं कर सकती, वैसे ही माया की उपासना करने से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं होता ।
✦ जिसने परब्रह्म को पीठ देकर अपना मन देवी३-देवताओं में लगाया है और जो अपने धन से माया रूप देवी देवताओं की ही सेवा पूजा भजन करता है, उसकी वह सब सेवा झूठी है ।
✦ विषय रूप गुणों को ग्रहण करके गुणरूप देवताओं को ही पूजते हैं, वह सब पूजा मिथ्या फल देने वाली होने से मिथ्या ही है । जैसे जल में डूबता हुआ जल को ही पकड़ता है, वह डूबता ही है, वैसे ही मूर्ख मन मायिक संसार में डूबते हुये माया को ही मुठ्ठी में पकड़ता है तब डूबता ही है ।
✦ जिसने गुरु का ज्ञान नहीं प्राप्त किया, वे सभी शांती सदन से बाहर रहकर व्याकुल४ हैं । ज्ञान५ बिना सबने दश इन्द्रिय रूप दशों६ दिशाओं में ही अपना मन लगाया है ।
(क्रमशः)

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