रविवार, 12 फ़रवरी 2023

*जीव रंक थैं छत्रपति कीयौ*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 *सत्यराम सा* 卐 🙏🌷
🌷🙏 *#संतटीलापदावली* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*दादू सतगुरु सहज में, किया बहु उपकार ।*
*निर्धन धनवंत करि लिया, गुरु मिलिया दातार ॥*
.
*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
===========
गुर कै द्वारै क्यूं न कमाइजै ।
जिहि कौ सदिकौ बैठां षाइ जै ॥टेक॥
जीव रंक थैं छत्रपति कीयौ ।
माथैं हाथ दे सरणैं लीयौ ॥
सोच बिचार करै जिनि कोई ।
रांम न मांनैं भला न होई ।
सेवा करी तिनहुं१ फल पाया ।
साहिब जी का रिजमा२ आया ॥
गुर दादू साहिब कौ३ अंग ।
टीला ताकौ करिलै संगा ॥२२॥
(पाठान्तर : १. तिनहीं, २. राजमां, ३. का)
.
गुरुमहाराज के द्वारै = निवासस्थान में रहकर उनके निर्देशानुसार क्यों नहीं कमाते=साधना करते हो । उनके दिए हुए दान को बैठे-बैठे खाइए ॥टेक॥ गुरुमहाराज का दान उनका उपदेश है । उनके उपदेश का सारतत्व रामनाम का अहर्निश स्मरण करना है । रामनाम स्मरण करने के लिए न धन की जरूरत है, न परिश्रम करने की जरूरत है और न कहीं आने-जाने की जरूरत है । इसी कारण बैठे-बैठे खाने की बात कही गई है ।
.
जीव को रंक से धनपति, राजा बना दिया । मस्तक पर हाथ रखकर शरण में रख लिया । अब सोच-विचार मत कर । बिना रामजी को माने, भला होना सम्भव नहीं ।
.
जिन्होंने भी सेवा की है, उन्होंने उसका फल प्राप्त किया है । साहिबजी रूप परब्रह्म-परमात्मा का रजमा=समान सामर्थ्य=सारुप्य प्राप्त हो जाता है । ‘ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति’ मुंडकोपनिषद् । गुरुमहाराज दादूजी साहिब के स्वरूप ही हैं । टीला कहता है, उनका संग करो ॥२२॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें