गुरुवार, 16 फ़रवरी 2023

*नित्यानन्द बलभद्र, कृष्ण चैतन्य कृष्णघन*

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*साधु शब्द सुख वर्षहि, शीतल होइ शरीर ।*
*दादू अन्तर आत्मा, पीवे हरि जल नीर ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami
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*छप्पय-*
*श्रीनित्यानन्द, श्रीकृष्ण चैतन्य*
*उभय भ्रात कलियुग प्रकट, भक्ति सु स्थापन कारनैं ॥*
*नित्यानन्द बलभद्र, कृष्ण चैतन्य कृष्णघन ।*
*कीन्हा दूर अधर्म, धर्म वर थप्यो भजन-पन ॥*
*प्रेम रसायन मत्त, बड़े जन अंध्री सेवत ।*
*जो नर लेवे नाम, ताहि उत्तम गति देवत ॥*
*पूरव गौड़ बंगाल के, तारे जन अवतार नैं।*
*में उभय भ्रात कलियुग प्रकट, भक्ति सु स्थापन कारनैं ॥२४९॥*
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श्रीबलरामजी और श्रीकृष्णजी दोनों भाई भक्ति की स्थापना करने के लिये कलियुग प्रकट हुये हैं। नित्यानन्दजी बलभद्रजी के अवतार हैं। कृष्णचैतन्यजी सच्चिदानन्दघन श्रीकृष्णजी के अवतार हैं। इन दोनों ने अधर्म को दूर करके श्रेष्ठ भक्ति रूप धर्म की स्थापना की और मनुष्यों के हृदय में भगवद्भजन करने का प्रण स्थापन किया अर्थात् भजन करने की प्रतिज्ञा कराई।
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दोनों भगवत् प्रेम रूप रसायन का पान करके मस्त रहते थे। आप दोनों के चरणों की सेवा महान् पुरुष भी करते थे। जो मनुष्य आपका नाम लेते थे उनको भी आप उत्तम गति प्रदान करते थे। इन दोनों अवतारों ने पूर्व में गौड़ बंगाल देश के लोगों का उद्धार किया है।
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*विशेष –* बंगाल की वीर भूमि जिले में 'एकचाका' गाँव में शाके १३९५ के माघ मास में नित्यानन्दजी का जन्म हुआ था। इनके पिता हाँड़ाई पंडित और माता पद्मावती बड़े धर्मनिष्ठ थे। एक समय इनके घर पर एक संन्यासी आये थे, निताई(नित्यानन्द) के स्वभाव और प्रतिभा पर आकृष्ट होकर उन्होंने निताई को अपने साथ ले लिया। निताई तीर्थयात्रा करते हुए ब्रज में पहुँचे।
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इस यात्रा में माधवेन्द्र पुरी से भेंट हुई। दोनों प्रेम से मिले। फिर निताई कृष्ण की खोज करते हुए वृन्दावन में पागल की भांति घूमने लगे। एक दिन महात्मा ईश्वरपुरी ने इनको कहा-यहाँ क्या देखते हो? तुम्हारे कृष्ण तो नवद्वीप में शची के घर पैदा हो गये हैं। निताई नवद्वीप आये और नन्दनाचार्य के घर ठहर गये।
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निमाई पण्डित(श्रीचैतन्य) ने अपने शिष्यों के सहित निताई के दर्शन किये। उस समय निमाई निताई दोनों प्रेम से मिले। फिर वे नव द्वीप में हरि नाम का प्रचार करने लगे। उन्होंने जगाई, मधाई जैसे पापियों का उद्धार किया। गौड़ में हरि नाम का प्रचार किया। फिर गौरांग के आदेश से निताई ने अम्बिकानगर के सूर्यदास की कन्या वसुधा और जाह्नवी का पाणिग्रहण किया। फिर वे खड़दह में भागीरथी गंगा के तट पर रहने लगे। इनके वीरचन्द्र नामक एक पुत्र भी हुआ था। एक दिन भगवान् के मन्दिर में हरि का नाम लेते-लते ही परमधाम को पधार गये थे।
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श्रीचैतन्य महाप्रभु का जन्म शक संवत् १४०७ की फाल्गुन शुक्ला १५ को दिन के समय सिंह लग्न में पश्चिम बंगाल के नवद्वीप नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र और माता का नाम शची देवी था। ये भगवान् श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। कृष्ण के विरह में उन्मत्त होकर रोने लगते थे तब पत्थर हृदय भी पिघल जाते थे।
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श्रीवासुदेव सार्वभौम और प्रकाशानन्द सरस्वती जैसे अद्वैत वेदान्ती भी इनके थोड़े से सत्संग से श्रीकृष्ण के प्रेमी भक्त बन गये थे। इन्होंने जीवों के उद्धार के लिए भगवन्नाम का जप कीर्तन ही मुख्य और सरल साधन माना है। आप चौबीस वर्ष की अवस्था तक गृहस्थाश्रम में रहे थे। इनने न्याय शास्त्र पर एक अपूर्व ग्रंथ लिखा था। जिसे देखकर इनके एक मित्र को बड़ी ईर्ष्या हुई थी। उनको यह भय हुआ कि इनका ग्रंथ प्रकाश में आने पर मेरे ग्रंथ का आदर कम हो जायगा।
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इस पर श्रीचैतन्य ने अपने ग्रन्थ को गंगाजी में बहा दिया था। इनकी पहली पत्नी लक्ष्मी देवी का देहान्त हो जाने पर इन्होंने दूसरा विवाह श्रीविष्णुप्रिया जी से किया था। चौबीस वर्ष की अवस्था में आपने केशव भारती नामक संन्यासी महात्मा से संन्यास ले लिया था। ये कई बार अपने प्रेमी भक्तों को भगवत् रूप में दिखाई दिया करते थे।
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अद्वैत प्रभु को विश्वरूप, नित्यानन्दजी को विष्णु तथा कृष्ण रूप में दिखाई दिये थे। शचीदेवी नित्यानन्दजी को बलराम और आपको कृष्ण रूप में देखती थी। गोदावरी के तट पर राय रामानन्द ने इन्हें कृष्ण और राधा के रूप में देखा था। अपने शेष जीवन में आप नीलाचल(पुरी) में रहने लग गये थे ॥२४॥
(क्रमशः)

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