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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२८. काल कौ अंग ६५/६८*
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दाना* दैत अनेक था, बलवंत बधता बांण ।
कहि जगजीवन दई गति, जम सों चल्या न पांण ॥६५॥
(*-*. पुरा काल में ऐसे वीर दैत्य हुए हैं जो बड़े से बड़े बलवान् को एक ही बाण में मार गिराते थे, परन्तु वे भी मृत्यु के सन्मुख विवश हो गये ॥६५॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बड़े बड़े दैत्य जिनके शौर्य व पराक्रम अद्वितीय थे संत कहते हैं कि उनको भी प्रभु ने जो गति दी उसमें यम के आगे उनका कुछ वश न चला ।
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अहंकार करि छत्रपति छीजै, हरि तजि गये बिलाइ ।
कहि जगजीवन रांम भजि, संत रहैं ल्यौ लाइ ॥६६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अहंकार कर के तो छत्रपति भी क्षीण होगये । परमात्मा को त्याग कर नाम विहीन होगये । संत कहते हैं कि हरि स्मरण करो संत हर समय परमात्मा से ही लौ लगाये रहते हैं ।
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बारह योजन छत्र था, गज तुरंग कइ लाख ।
कहि जगजीवन रांम बिन, ते पुनि ह्वै गये खाख ॥६७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बारह योजन भूमि पर जिनका राज्य होत था हाथी और घोड़़े कितने ही लाख थे जिनके पास । संत कहते हैं वे भी राम बिंना मृत्यु को प्राप्त हो राख होगये ।
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(कहि) जगजीवन आकार नहीं, निराकार है मूल ।
रांम बिमुख उपजै खपै, वोला१ ज्यूं अस्थूल ॥६८॥
{१. वोला=ओला(शरदृतु की वर्षा में जल की बूंदों के साथ गिरने वाले बर्फ के टुकड़े)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु का कोइ आकार नहीं वे निराकार है । जो जीव प्रभु विमुख होते हैं वे आकाश से गिरे ओलों की भांति स्थूल दिखते हुये भी जल में परिवर्तन कर अस्थूँल हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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