गुरुवार, 9 मार्च 2023

*तपस्या के प्रभाव से*

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*जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ ।*
*दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"तपस्या के प्रभाव से नारायण भी सन्तान होकर जन्म लेते हैं । कामारपुकुर के रास्ते में एक तालाब पड़ता है, नाम है रणजित राय का तालाब । रणजित राय के यहाँ भगवती ने कन्या होकर जन्म लिया था । अब भी चैत के महीने में वहाँ मेला लगता है । जाने की मेरी बड़ी इच्छा होती है, परन्तु अब नहीं जाया जाता ।
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"रणजित राय वहाँ का जमींदार था । तपस्या के प्रभाव से उसने भगवती को कन्या के रूप में पाया था । कन्या पर उसका बड़ा स्नेह था । उसी स्नेह के कारण वह अपने पिता का संग नहीं छोड़ती थी । एक दिन रणजित अपनी जमींदारी का काम कर रहा था, फुरसत नहीं थी ।
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लड़की, बच्चों का स्वभाव जैसा होता है, बार बार पूछ रही थी - 'बाबूजी, यह क्या है ? - वह क्या है ?' पिता ने बड़े मधुर स्वर से कहा, 'बेटी, अभी जाओ, बड़ा काम है ।' पर लड़की वहाँ से किसी तरह नहीं टली । अन्त में ध्यानरहित हो उसके बाप ने कहा, 'तू यहाँ से दूर हो जा ।'
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कन्या वहाँ से चली आयी । उसी समय एक शंख की चूड़ियाँ बेचनेवाला वहाँ से जा रहा था । उसे बुलाकर उसने शंख की चूड़ियाँ पहनीं । दाम देने की बात पर उसने कहा, 'घर की अमुक अलमारी की बगल में रुपये रखे हैं, माँग लेना ।' और यह कहकर वहाँ से चली गयी, फिर नहीं दीख पड़ी । उधर घर में चूड़ीवाला पुकार रहा था ।
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तब लड़की को घर में न देख, सब इधर-उधर दौड़ पड़े । रणजित राय ने खोज करने के लिए जगह-जगह आदमी भेजे । चुड़ीवाले का रुपया उसी जगह मिला । रणजित राय रोते हुए घूम रहे थे, इतने में ही किसी ने कहा, 'तालाब में कुछ दीख पड़ता है ।'
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लोगों ने उसके किनारे पर खड़े होकर देखा, एक हाथ जिसमें वही शंख की चूड़ियाँ थीं, पानी के ऊपर उठा हुआ था । फिर वह हाथ भी न दीख पड़ा । अब भी मेले के समय भगवती की पूजा होती है, - वारुणी के दिन । (मास्टर से) यह सब सत्य है ।"
मास्टर – जी हाँ ।
श्रीरामकृष्ण - नरेन्द्र अब यह सब मानता है ।
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"पूर्ण का जन्म विष्णु के अंश से है । मन ही मन बिल्व-पत्र से मैंने पूजा की – पूजा ठीक न हुई, तब चन्दन और तुलसीदल लिया । तब पूजा ठीक हुई ।
"वे अनेक रूपों से दर्शन देते हैं । कभी नररूप से, कभी चिन्मय ईश्वर के रूप से । रूप मानना चाहिए - क्यों जी ?"
मास्टर - जी हाँ ।
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श्रीरामकृष्ण - कामारहाटी की ब्राह्मणी (गोपाल की माँ) तरह तरह के रूप देखती है; गंगा के किनारे, एक निर्जन कुटिया में अकेली रहती है और जप किया करती है । गोपाल के पास सोती है । (कहते ही कहते श्रीरामकृष्ण चौंके) कल्पना में नहीं, साक्षात् । उसने देखा, गोपाल के हाथ लाल हो रहे हैं ! गोपाल उसके साथ साथ घूमते हैं ! - उसका दूध पीते हैं ! - बातचीत करते हैं । नरेन्द्र रोने लगा !
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"पहले मैं भी बहुत कुछ देखा करता था । इस समय भाव में उतना दर्शन नहीं होता । अब प्रकृति-भाव घट रहा है । पुरुष-भाव आ रहा है । इसीलिए अन्तर में ही भाव रहता है, बाहर उतना प्रकाश नहीं हो पाता ।
"छोटे नरेन्द्र का पुरुष-भाव है, - इसीलिए मन लीन हो जाया करता है । भावादि नहीं होते । नित्यगोपाल का प्रकृति-भाव है; इसीलिए टेढ़ा-मेढ़ा बना रहता है - भावावेश में शरीर लाल हो जाता है ।"
(क्रमशः)

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