मंगलवार, 18 अप्रैल 2023

शुद्धा भक्ति

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*मैं मैं करत सबै जग जावै, अजहूँ अंध न चेते रे ।*
*यह दुनिया सब देख दिवानी, भूल गये हैं केते रे ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २९)*
===============
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - मैं समझा, तुम्हारा मत पण्डितों जैसा है कि जो जैसा कर्म करेगा, उसे वैसा फल मिलता रहेगा; यह सब छोड़ दो । ईश्वर की शरण में जाने पर कर्मों का क्षय हो जाता है । मैंने माता के पास हाथ में फूल लेकर कहा था, 'माँ, यह लो अपना पाप और यह लो अपना पुण्य, मैं कुछ नहीं चाहता; तुम मुझे शुद्धा भक्ति दो । यह लो अपना भला और यह लो अपना बुरा; मैं भला-बुरा कुछ नहीं चाहता; मुझे बस अपनी शुद्धा भक्ति दो । यह लो अपना धर्म और यह लो अपना अधर्म, मैं धर्माधर्म कुछ नहीं चाहता; मुझे शुद्धा भक्ति दो । यह लो अपना ज्ञान और यह लो अपना अज्ञान; मैं ज्ञान अज्ञान कुछ नहीं चाहता; मुझे शुद्धा भक्ति दो । यह लो अपनी शुचिता और यह लो अपनी अशुचिता; मुझे शुचिता-अशुचिता नहीं चाहिए, मुझे शुद्धा भक्ति दो ।"
.
नन्द बसु - क्या वे कानून रद्द कर सकते हैं ?
श्रीरामकृष्ण - यह क्या ! वे ईश्वर हैं, वे सब कुछ कर सकते हैं । जिन्होंने कानून बनाया है, वे कानून बदल भी सकते हैं ।
"परन्तु यह बात तुम कह सकते हो । तुम्हारी शायद भोग करने की इच्छा हैं, इसीलिए तुम ऐसी बात कह रहे हो । यह एक मत है भी, - ठीक है; भोग की शान्ति बिना हुए चैतन्य नहीं होता; परन्तु भोग भी क्या करोगे ? - कामिनी और कांचन का भोग ? - वह तो अभी है, अभी नहीं; क्षणिक । कामिनी और कांचन में है ही क्या ? छिलका और गुठली ही है - खाने पर अम्लशूल होता है । सन्देश निगलने के साथ ही स्वाद भी गायब !”
.
नन्द बसु चुप हो रहे । फिर कहा – ‘यह सब कहते तो हैं, परन्तु क्या ईश्वर पक्षपात करनेवाले हैं ? अगर उनकी कृपा से होता है, तो कहना पड़ता है कि ईश्वर में पक्षपात है ।’
श्रीरामकृष्ण - वे स्वयं ही सब कुछ हैं । ईश्वर स्वयं ही जीव जगत् हुए हैं । जब पूर्ण ज्ञान होगा, तब यह बोध होगा । वे मन, बुद्धि और देह हुए हैं - चौबीसों तत्त्व सब वे ही हुए हैं । वे पक्षपात करें भी तो किस पर करें ?
.
नन्द बसु - अनेक रूपों का धारण उन्होंने क्यों किया ? - कोई ज्ञानी और कोई अज्ञानी क्यों है ?
श्रीरामकृष्ण - उनकी इच्छा ।
अतुल - केदार ने अच्छा कहा है । एक ने उनसे पूछा, 'ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण क्यों किया ?' इस पर वे बोले, "जिस मीटिंग में ईश्वर ने सृष्टि बनाने का ठहराया, उस मीटिंग में मैं हाजिर नहीं था ।' (सब हँसते हैं)
श्रीरामकृष्ण - उनकी इच्छा ।
.
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे ।
“ ‘सब तुम्हारी ही इच्छा है, तुम इच्छामयी तारा हो । माँ, अपने कर्म तुम खुद करती हो, परन्तु लोग कहते हैं कि मैं करता हूँ । ऐ काली, हाथी को तो तुम दलदल में फँसा देती हो और किसी पंगु से गिरि का उल्लंघन करा देती हो । किसी को तुम ब्रह्मपद दे देती हो और किसी को तुम अधोगामी कर देती हो ।'
.
“वे आनन्दमयी हैं । इसी सृष्टि, स्थिति और प्रलय की लीला कर रही हैं । जीव असंख्य हैं, उनमें दो ही एक मुक्त हो रहे हैं, उससे भी उन्हें आनन्द होता है । कोई संसार में बँध रहा है, कोई मुक्त हो रहा है ।"
नन्द बसु - उनकी इच्छा तो है, परन्तु इधर तो जान निकली जा रही है ।
श्रीरामकृष्ण - तुम लोग हो कहाँ ? वे ही सब कुछ हुए हैं । जब तक उन्हें तुम नहीं समझ सकते हो, तभी तक 'मैं मैं' कर रहे हो ।
.
"सब लोग अगर उन्हें जान लें तो तर जायँ । परन्तु बात यह है कि किसी को दिन निकलते ही खाने को मिल जाता है, कोई दोपहर के समय भोजन पाता है और कोई शाम को; परन्तु खाना सभी को मिल जाता है - कोई बिना खाये हुए नहीं रहता । इसी तरह अपने स्वरूप का ज्ञान सभी प्राप्त करेंगे ।"
पशुपति - जी हाँ, जान पड़ता है, वे ही सब कुछ हुए हैं ।
.
श्रीरामकृष्ण - मैं क्या हूँ, इसे जरा खोजो तो । क्या मैं हाड़ हूँ ? माँस, खून या आँत हूँ ? 'मैं' को खोजते ही खोजते 'तुम' आ जाता है; अर्थात् अन्दर में उस ईश्वर की शक्ति के सिवा और कुछ नहीं है । 'मैं' नहीं है, 'वे' हैं (नन्द बसु के प्रति) तुममें अभिमान नहीं है - इतना ऐश्वर्य होकर भी ।
.
" 'मैं' का सम्पूर्ण त्याग नहीं होता । यह सब जाने का नहीं तो रहने दो इसे ईश्वर का दास बना । मैं ईश्वर का भक्त हूँ, ईश्वर का दास हूँ, ईश्वर का पुत्र हूँ, यह अभिमान अच्छा है । जो 'मैं' कामिनी और कांचन में फँसता है वह कच्चा 'मैं' है, उसी का त्याग करना चाहिए ।"
अहंकार की यह व्याख्या सुनकर गृहस्वामी और दूसरे लोग बहुत प्रसन्न हुए ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें