बुधवार, 19 अप्रैल 2023

*माधवदासजी*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार ।*
*समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*माधवदासजी*
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*इन्दव-*
*माधवदास तिया तन त्यागत,*
*यूं द्विज जान मिथ्या व्यवहारा ।*
*पुत्र बड़ो हुई जाय तजूं गृह,*
*और भई दिखई करतारा ॥*
*छाड़ि दियो गृह पालत है वह,*
*मानत हूँ करता सु गँवारा ।*
*आय परे जगनाथपुरी तट,*
*धीरज भूख न प्यास विचारा ॥३२४॥*
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माधवदासजी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। महा विद्वान् और भगवत्-भक्त भी थे। आप की स्त्री का देहान्त हो जाने पर आपके हृदय में इस प्रकार विचार उत्पन्न हुआ कि यह संसार का व्यवहार तो मिथ्या ही है।
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मैं चाहता था कि पुत्र बड़ा हो जायगा तब घर छोड़ दूँगा, किन्तु मेरी इच्छा से विपरीत दूसरी ही बात सृष्टिकर्ता प्रभु ने दिखा दी है।
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इत्यादिक विचार करके तीव्र वैराग्यपूर्वक घर को त्याग दिया और मन में विचार किया कि ये मेरे माता पुत्रादि जितने देहधारी हैं, उन सबके पालन-पोषण कर्ता तो वे परमेश्वर ही हैं। मैं जो उनके पालन-पोषण का कर्ता अपने को मानता हूँ, सो मेरा महान् गँवारपना है।
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ऐसा विचार करके आप जगन्नाथपुरी आ गये तथा समुद्र के तट पर एकान्त में ठहर गये और भूख प्यास का कुछ भी विचार नहीं करके धैर्यपूर्वक हरि भजन में लगे रहे ।
(क्रमशः)

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