बुधवार, 5 अप्रैल 2023

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
साभार : Subhash Jain
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लाख करोड अरव्ब खरव्बनि
नील पदम्म तहा लग घाटी ।
जोड हि जोड भण्डार भरे सब
और रही सु जिभी तल दाटी ॥
तो हु न तोहि संतोष भया गठ
'सुन्दर' ते तृष्णा नहिं काटी ।
सूझत नाहि जु काल सदा शिर
मार के थाप मिलावत माटी ॥४॥
(सुंदरविलास-सवैया ग्रंथ)
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सुवन-
रूपल्स उपया भवे,
सिया हु केलाससमा नंबरा।
नरस्त लुद्धस्स न तेहि किंचि,
इच्छा हु आगातसमा श्रणन्तिया॥८॥
पुढवी साली जवा चेव, हिरणं पतुभिस्तह ।
पडिपुण्णं नालगत्त, इइ विज्जा तवं चरे ॥
(महावीर वाणी)
चांदी और सोने के कैलास के समान विशाल असंख्य पर्वत भी यदि पास में हो, तो भी लोभी मनुष्य की तृप्ति के लिए वे कुछ भी नहीं । कारण कि तृष्णा आकाश के समान अनन्त है । चावल और जौ आदि घान्यों तथा सुवर्ण और पशुओं से परि-पूर्ण यह समस्त पृथिवी भी लोभी मनुष्य को तृप्त कर सकने में असमर्थ है-—यह जानकर संयम का ही आचरण करना चाहिए ।
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