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*राम तुम्हारे नांव बिन, जे मुख निकसै और ।*
*तो इस अपराधी जीव को, तीन लोक कित ठौर ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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राग कानड़ौ ॥९॥
रे जिव१ बातनि जनम गवायौ ।
संग ही सदा रहै हरि तेरे, तासूं मन नहिं लायौ२ ॥टेक॥
लटकत फिरत घरैं घर डोलत, इत उत चितवत३ धायौ ॥
सेयौ नहीं निरंजन साहिब, ताकौ जस नहिं गायौ ॥
जिभ्या स्वादि श्रवण रस लायौ, कियौ है इंद्रिन कौ भायौ ॥
टीला गुर दादू समझायौ, ‘तासौं४ चित नहिं लायौ’ ॥४२॥
(पाठान्तर : १. जीव, २. लायौ, ३. ‘चितवत’ नहीं है, ४. यह पंक्ति छूट गई है)
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हे जीव ! तूने सांसारिक बातों को करने में ही सारा समय नष्ट कर डाला । परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा सदैव तेरे साथ तेरे अन्दर ही रहता है । फिर भी तू उसमें मन को संलग्न नहीं करता है ।
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लटकता-फिरता घर-घर डोलता-फिरता है । इधर-उधर देखता फिरता है । तूने निरंजन-निराकार साहिब को कभी भी नहीं साधा, उसकी साधना नहीं की; उसके यशों का गुणगान नहीं किया ।
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जिव्हा के स्वादों और श्रवणों द्वारा रसों को ही लेने में लगा रहा और इन्द्रियों को जो अच्छा लगा वही करता रहा । टीला कहता है, दादूजी महाराज ने जो परमार्थी ज्ञान समझाया उसको कभी भी चित्त में नहीं लाया, उसमें कभी भी चित्त को नहीं लगाया ॥४२॥
(क्रमशः)
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