सोमवार, 3 अप्रैल 2023

*२९. संजीवन कौ अंग १३/१६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२९. संजीवन कौ अंग १३/१६*
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कहि जगजीवन रांमजी, देह चढ़ी निज ठांम ।
ते काया कंचन भई, नख सिख नूरी४ नांम ॥१३॥
(४. नूरी=तेजोमय)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वह ही देह सार्थक है जो परमात्मा तक पहुंच पाये । वे ही सच्चा ठिकाना है । वह देह प्रभु के तेजोमय नाम से कंचन हो जाती है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, वपु राखै तुम मांहि ।
सोई जन अमर अलेख भजि, काल मीच भै नांहि ॥१४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जो अपना अस्तित्व आप में रखते हैं, जो अमर अलेख प्रभु का भजन करते हैं उन्हें मृत्यु भय नहीं रहता है ।
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देही मांहि विदेह हरि, अबिगत रांम अगाध ।
कहि जगजीवन तहां मन, निहचल करै सु साध ॥१५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो शरीर में ही विदेह या निर्लिप्त भाव से रहे, और जहाँ राम पर भरोसा हो, संत कहते हैं कि ऐसे ही स्थान पर मन निश्चिंत रहता है ।
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पंच५ पठावै पीव घर, प्रक्रिति तजै पच्चीस६ ।
कहि जगजीवन सकल साध जहं, तहां नवावै सीस ॥१६॥
{५. पंच-पञ्च तत्त्व(पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश)}
{६. पचीस-पच्चीस(२५) तत्त्व(सांख्य मत के अनुसार)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पांचों इन्द्रियों को प्रभु समर्पित कर पच्चीस प्रकृतियों को त्याग कर संत वहां ही शीश निवाते हैं ।
(क्रमशः)

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