मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

रांमजी नांव२ तुम्हारौ दीजै,

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*दादू देखत ही भया, श्याम वर्ण तैं सेत ।*
*तन मन यौवन सब गया,*
*अजहुँ न हरि सौं हेत ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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राग सोरठ१ ॥८॥
रांमजी नांव२ तुम्हारौ दीजै, 
मोहि अपनां३ करि लीजै ॥टेक॥
चारि पहरि दिन जाई । रैंनि अंधारी आई ॥
आठ पहर यूँ४ बीता । तुम्ह सूं लागै नहिं चीता ॥
बालापण षेलि गवायौ । तरणापै रांम न गायौ ॥
तीजै चित न लावै६ । चौथे प्रांणीं पछितावै७ ॥
जब तैं जोनि षंदायौ । भ्रमि भ्रमि जनम गवायौ ॥
उलटि न कियौ बिचारा । तौ क्यूं उतरै भौ पारा ॥
जीव कुं८ जुरा९ बियापै । क्रिया करि कांइ न कापै ॥
अब टीलौ करै पुकारा । तूं है धणी हमारा ॥४१॥
(पाठान्तर : १. सोरठि, २. नांउं, ३. अपनौं, ४. यौं, ५. ‘सूं’ नहीं है, ६. लायौ, ७. पछितायौ, ८. कौं, ९. जुरहा)
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विनती करते हुए कहते हैं, हे रामजी ! अपना नाम मुझे प्रदान करिए और मुझको अपना बना लीजिए ।
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चार प्रहारात्मक दिन के जाने पर अन्धकारयुक्त रात्रि आती है । इस प्रकार चार प्रहर दिन के व चार प्रहर रात्रि के योंही व्यर्थ व्यतीत हो जाते हैं किन्तु यह संसारासक्त मन आपमें अनुरक्त होता नहीं है ।
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बाल्यावस्था खेलकूद में व्यतीत कर डाली । तरुणावस्था में भी रामजी के नाम का स्मरण नहीं किया । तीसरी अवस्था में भी पुराने संस्कारों के कारण चित्त भगवद्भजन में नहीं लगता है । अन्ततः चौथी जरावस्था आने पर प्राणी पश्चाताप करता है ।
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जब से परमात्मा ने जीव को जन्मने-मरने को संसार में भेजा है तबसे नाना-योनियों में जन्मकर और मरकर जन्मों को व्यर्थ ही गँवाया है । इस बारम्बार भ्रमण के विपरीत अभ्रमणावस्था प्राप्त्यर्थ विचार ही नहीं किया । बताइए, फिर भवसागर से कैसे पार उतर सकता है प्राणी ।
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मुझको अब जरावस्था व्याप गई है कृपा करके मेरी जरावस्था को क्यों नहीं काट देते हो । अब टीला पुकार कर कहता है, हे परमात्मन् ! आप ही मेरे स्वामी हो । बस, आप ही मेरा उद्धार कर सकते हो । मैं आपसे मेरा उद्धार करने की प्रार्थना करता हूँ ॥४१॥
(क्रमशः)

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